Verse 1.1
मूर्तित्वे परिकल्पितः शश भृतो वर्त्मापुनर्जन्मनामात्मेत्यात्म विदां क्रतुश्च यजतां भर्तामर ज्योतिषाम्। लोकानां प्रलयोद्भवस्थिति विभुश्चानेकधायः श्रुतौ वाचं नः सददात्वनेक किरणस्त्रैलोक्यदीपो रविः
Personalised to your chart
अनुवाद जो मूर्ति रूप में परिकल्पित हैं, शशधर (चंद्रमा) के मार्ग और पुनर्जन्म के नाम हैं, आत्माविदों के लिए आत्मा स्वरूप हैं, यज्ञ करने वालों के लिए यज्ञ के स्वामी हैं, अमर ज्योतिषों (देवताओं) के पालनहार हैं, लोकों के प्रलय, उत्पत्ति और स्थिति के विभु (समर्थ स्वामी) हैं, वेदों में जिनका वर्णन अनेक प्रकार से हुआ है, वे अनेक किरणों वाले त्रिलोक के दीपक सूर्यदेव हमें सदा वाणी (ज्ञान या कल्याण) प्रदान करें।
अर्थ इस मंगलाचरण श्लोक में ऋषि वराहमिहिर ज्योतिष शास्त्र के आद्य स्रोत और साक्षी सूर्यदेव का ध्यान करते हैं। यहाँ सूर्य को केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि चेतना का मूल स्तंभ माना गया है। वे चंद्रमा की कलाओं के नियामक हैं और जीवों के पुनर्जन्म के चक्र को संचालित करने वाले काल के प्रतीक हैं। जो व्यक्ति आत्म-ज्ञान में स्थित हैं, उनके लिए सूर्य स्वयं आत्मा का प्रकाश हैं, जबकि कर्मकांड में रत यजमानों के लिए वे यज्ञ के फलदाता और देवताओं के पोषक हैं।
इसके अतिरिक्त, सूर्य को सृष्टि के तीन मुख्य अवस्थाओं—उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय—का एकमात्र स्वामी बताया गया है। वेदों में उनका महिमामंडन अनेक रूपों में हुआ है क्योंकि वे त्रिलोक को प्रकाशित करने वाले एकमात्र दीपक हैं। ज्योतिष का अध्ययन वास्तव में इसी दिव्य प्रकाश के माध्यम से काल और कर्म के रहस्यों को समझने का प्रयास है। जब तक यह आंतरिक और बाह्य प्रकाश हमें नहीं मिलता, तब तक ज्ञान का मार्ग अंधकार में ही रहता है।
चिंतन आज दिन में एक बार, जब भी आप सूर्य का प्रकाश देखें या उसकी गर्माहट अनुभव करें, तो क्षण भर के लिए रुककर यह भावना करें कि यह केवल भौतिक रोशनी नहीं, बल्कि वह चेतना है जो आपके भीतर के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटा रही है। स्वयं से पूछें कि क्या मेरे विचार और कर्म उसी स्पष्टता और ताप से युक्त हैं जो जीवन को धारण करते हैं, या वे अभी भी भ्रम की छाया में हैं? इस प्रकाश को अपने हृदय में उतरने दें और संकल्प लें कि आज का दिन आप स्पष्ट दृष्टि और सत्यनिष्ठा के साथ बिताएंगे।
A contemplative reading in the spirit of the Jyotish — classical Vedic astrology tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
Get your free birth chart →
Sign in and the readings shift to your own placements.
Go deeper
Sign in to ask your own questions of this verse — answered
in its light, and in the light of your chart.
Sign in →
Drag to pan · scroll to zoom · click a node to open it