Verse 1.3
होरेत्यहो रात्र विकल्पम्एके वाञ्छन्ति पूर्वापर वर्ण लोपात्। कर्माजितं पूर्व भवे सद् आदि यत्तस्य पङ्क्तिं समभिव्यनक्ति
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अनुवाद कुछ विद्वान् 'होरा' शब्द को दिन और रात्रि के विभेद (विकल्प) के रूप में स्वीकार करते हैं, जबकि अन्य पूर्व और उत्तर वर्णों के लोप होने के कारण इसे एकल मानते हैं। जो कर्म पूर्व जन्म में जीता गया था, वही सद् रूप में आदि में स्थित होता है और उसकी पंक्ति (श्रेणी) को स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है।
अर्थ इस श्लोक में ज्योतिष की मूल अवधारणा 'होरा' अर्थात समय के विभाजन और उसके पीछे छिपे कर्म सिद्धांत का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। यहाँ दो मतों का उल्लेख है: एक पक्ष समय को दिन और रात के द्वैत में देखता है, जबकि दूसरा पक्ष भाषाई और तत्वगत दृष्टि से इसे एक अखंड इकाई मानता है। वाराहमिहिर संकेत करते हैं कि बाह्य रूप से समय का विभाजन भले ही विद्वानों के बीच चर्चा का विषय हो, किंतु वास्तविकता यह है कि समय का प्रवाह पूर्व जन्म के संचित कर्मों द्वारा संचालित होता है।
दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक हमें बताता है कि हमारे वर्तमान अस्तित्व की शुरुआत और उसकी दिशा पूर्व के कर्मों द्वारा निर्धारित 'सद्' (सत्य या वास्तविकता) से निकलती है। जो कुछ भी हम आज अनुभव कर रहे हैं, वह केवल संयोग नहीं है, बल्कि पूर्व भव में अर्जित कर्मफल की एक सुव्यवस्थित पंक्ति है जो अब अभिव्यक्त हो रही है। समय केवल एक खाली पात्र नहीं है, बल्कि वह कर्म के परिपक्व होने का माध्यम है जो व्यक्ति के जीवन पथ को गढ़ता है।
चिंतन आज के दिन जब भी आप घड़ी देखें या दिन और रात के बदलाव को अनुभव करें, तो एक क्षण रुककर यह विचार करें कि यह समय का प्रवाह आपके पूर्व के प्रयासों और कर्मों का ही प्रतिफल है। किसी भी घटना, चाहे वह सुखद हो या कठिन, को केवल संयोग न मानकर यह भावना रखें कि यह आपके कर्मों की उस पंक्ति का एक अक्षर है जो अभी पढ़ा जा रहा है। इस जागरूकता के साथ दिन के कार्यों को करें ताकि वर्तमान क्षण में किया गया कर्म भविष्य की पंक्ति को शुभ बना सके।
A contemplative reading in the spirit of the Jyotish — classical Vedic astrology tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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