Karika 2
यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं यस्माच् च निर्गतम् तस्यानावृतरूपत्वान् न निरोधोऽस्ति कुत्रचित्
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अनुवाद जिसमें यह सम्पूर्ण कार्य (सृष्टि) स्थित है और जिससे यह निर्गत हुई है, उस तत्त्व का स्वरूप कभी भी आवृत नहीं होता; अतः उसमें कहीं पर भी कोई निरोध या रुकावट संभव नहीं है।
अर्थ यह कारिका उस परम स्पंदन तत्त्व की बात करती है जो सृष्टि का आधार और स्रोत है। जिस प्रकार लहरें समुद्र में उत्पन्न होती हैं और अंततः उसी में विलीन हो जाती हैं, वैसे ही यह सम्पूर्ण जगत उस चैतन्य शक्ति में निवास करता है और उसी से प्रकट होता है। यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि वह तत्त्व स्वभावतः ही प्रकाशमान है और कभी भी किसी आवरण या अज्ञान से ढका नहीं रहता। उसकी चेतना सदैव खुली, स्वतंत्र और अबाधित है।
चूँकि वह तत्त्व कभी आवृत नहीं होता, इसलिए वास्तविकता में कहीं भी कोई बंधन या रुकावट नहीं है। हमें जो सीमाएँ, भय या अवरोध दिखाई देते हैं, वे केवल हमारी अपनी सीमित दृष्टि का भ्रम हैं, न कि उस परम स्पंदन की वास्तविकता। जब साधक यह समझ लेता है कि उसका अपना स्वरूप वही अबाधित चेतना है, तो जीवन की सभी बाधाएँ मिथ्या प्रतीत होने लगती हैं और वह जान लेता है कि उसकी शक्ति में कोई भी चीज उसे रोक नहीं सकती।
चिंतन दिन भर में जब भी आपको किसी कार्य में अवरोध महसूस हो या मन में यह भाव आए कि 'मैं नहीं कर पा रहा', तो तुरंत रुकें और उस भावना को पकड़ने के बजाय उस पृष्ठभूमि को देखें जहाँ यह भावना उठ रही है। स्वयं से धीरे से कहें कि जिस चेतना में यह रुकावट का विचार आ रहा है, वह चेतना स्वयं कभी रुकी नहीं है। उस अबाधित स्पंदन का स्मरण करें और देखें कि कैसे अवरोध का भार हल्का होकर फिर से प्रवाह में बदल जाता है।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Spanda — the doctrine of vibration) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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