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Karika 3

जाग्रदादिविभेदेऽपि तदभिन्ने प्रसर्पति निवर्तते निजान् नैव स्वभावादुपलब्धृतः

अनुवाद जाग्रत आदि अवस्थाओं के भेद होने पर भी, जब चेतन तत्व (शिव) इनमें प्रसरण करता है या इनसे निवृत्त होता है, तो वह ज्ञाता द्वारा अनुभव किए जाने पर अपने निज स्वभाव से कभी भी भिन्न नहीं होता।

अर्थ इस कारिका का मूल तात्पर्य यह है कि虽然我们 जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति जैसी विभिन्न अवस्थाओं को अनुभव करते हैं, जिनमें चेतना का प्रसार और संकुचन प्रतीत होता है, फिर भी उस चेतना का स्वरूप अपरिवर्तित रहता है। जैसे सूर्य का प्रकाश विभिन्न पात्रों में फैलता या सिमटता प्रतीत हो लेकिन स्वयं सूर्य में कोई परिवर्तन नहीं आता, वैसे ही स्पंद तत्व अवस्थाओं के उदय और अस्त में भी अपने पूर्ण और अखंड स्वरूप में स्थिर रहता है। भेद केवल उपकरणों या अवस्थाओं में है, चेतना में नहीं।

यहाँ 'उपलब्धृतः' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है 'ज्ञाता द्वारा जाना गया'। जब साधक इस बात को गहराई से अनुभव कर लेता है कि बदलती हुई अवस्थाओं के पीछे एक अटल साक्षी मौजूद है, तो उसे बोध होता है कि चेतना कभी भी अपने स्वभाव से विचलित नहीं हुई। यही स्पंद का रहस्य है कि गतिशीलता के बीच भी जो अगतिशील शांति विद्यमान है, वही हमारा वास्तविक स्वरूप है। भेद के बावजूद अभेद का यह अनुभव ही मुक्ति की कुंजी है।

चिंतन आज के दिन जब भी आप किसी स्थिति से दूसरी स्थिति में जाएं, जैसे नींद से जागना, काम से विश्राम, या एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना, तो एक क्षण रुककर यह देखें कि जो 'देखने वाला' इन सभी बदलावों को जान रहा है, क्या वह बदला है? केवल यह स्मरण करें कि परिदृश्य बदल रहा है, परंतु द्रष्टा का स्वभाव वही अटल स्पंद बना हुआ है। इस अटल साक्षीभाव को पकड़कर ही दिन के कार्यों को करें।

A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Spanda — the doctrine of vibration) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.

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