Verse 1.1
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये सन्दर्शनं वितनुते पितृदेवनॄणां मासाब्दवासरदलैरथ ऊर्ध्वगं यत्। सव्यं क्वचित्क्वचिदुपैत्यपसव्यमेकं ज्योतिः परं दिशतु वस्त्वमितां श्रियं नः
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अनुवाद श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, चंद्रमा के समान कांतिमान, चतुर्भुज और प्रसन्न मुख वाले देवता का ध्यान सभी विघ्नों की शांति के लिए किया जाए। वह ज्योति जो पितृओं, देवताओं और मनुष्यों के दर्शन को महीनों, वर्षों और दिनों के खंडों द्वारा ऊर्ध्वगति में विस्तारित करती है, जो कभी दक्षिणावर्त तो कभी वामावर्त गति से युक्त होती है, वह परम ज्योति हमें असीम ऐश्वर्य प्रदान करे।
अर्थ इस मूल श्लोक में ग्रह फलित ज्योतिष शास्त्र के आरंभ में ईश्वरीय कृपा और ज्योतिषीय गणना के मूल तत्व का समन्वय दिखाया गया है। यहाँ 'शुक्लाम्बरधरं देवं' से तात्पर्य उस दिव्य चेतना से है जो शुद्धता और ज्ञान का प्रतीक है। ज्योतिष केवल गणितीय सूत्र नहीं है, बल्कि यह समय के प्रवाह को समझने का एक साधन है जो पितृओं, देवताओं और मनुष्यों के बीच के संबंधों को उजागर करता है। समय के खंड—मास, वर्ष और दिन—केवल कैलेंडर की इकाइयाँ नहीं हैं, बल्कि वे उस परम ज्योति के स्पंदन हैं जो हमारे कर्मों के फल को परिपक्व करती हैं।
दूसरी ओर, श्लोक में सूर्य या ज्योति की गति का वर्णन 'सव्यं' (दक्षिणावर्त) और 'अपसव्यं' (वामावर्त) शब्दों से किया गया है, जो राशियों और ग्रहों की गतिशीलता की ओर संकेत करता है। यह बताता है कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा स्थिर नहीं है; यह परिस्थितियों के अनुसार दिशा बदलती है और मनुष्य के भाग्य को प्रभावित करती है। इस जटिल गतिशीलता के पीछे एक ही उद्देश्य है—मनुष्य को असीम ऐश्वर्य और कल्याण की ओर ले जाना, बशर्ते वह इन संकेतों को समझकर अपने कर्मों को उस परम ज्योति के अनुरूप ढाल ले।
चिंतन आज के दिन जब भी आप समय देखें, चाहे वह घड़ी हो या कैलेंडर की तारीख, तो एक क्षण रुककर यह विचार करें कि यह समय का खंड केवल एक संख्या नहीं, बल्कि ईश्वरीय ज्योति का एक विशिष्ट संदेश है। अपने कार्य आरंभ करने से पूर्व मन ही मन उस श्वेत वस्त्रधारी प्रसन्न देव का स्मरण करें और प्रार्थना करें कि आज का दिन आपके लिए आने वाले सभी संभावित विघ्नों का शमन करे और आपको सही दिशा का मार्गदर्शन दे।
A contemplative reading in the spirit of the Jyotish — classical Vedic astrology tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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