Verse 1.2
वाग्देवीं कुलदेवतां मम गुरून्कालतयज्ञानदान् सूर्यदींश्च नवग्राहन्गणपातिं बक्त्या प्रणम्येश्वरम्। संक्षिप्यात्रिपराशरादिकथितान्मन्त्रेश्वरो दैवविद् वक्ष्येऽहं फलदीपिकां सुविमलां ज्योतिर्विदां प्रीत्ये
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अनुवाद वाणी की देवी सरस्वती, अपने कुल की इष्ट देवता, अपने गुरुजन, कालरूपी यज्ञ के ज्ञानदाता सूर्य आदि नवग्रह, गणपति और ईश्वर का भक्तिपूर्वक प्रणाम करके; मैं, मन्त्रेश्वर नामक यह ज्योतिषी, त्रिपराशर आदि महर्षियों द्वारा कथित शास्त्रों को संक्षिप्त करते हुए, ज्योतिषविदों के हृदय को प्रसन्न करने के लिए इस अत्यंत निर्मल 'फलदीपिका' ग्रंथ का वर्णन करूँगा।
अर्थ यह मंगलाचरण केवल एक औपचारिक प्रार्थना नहीं, बल्कि ज्ञान प्राप्त करने की पात्रता का घोषणापत्र है। लेखक मन्त्रेश्वर स्पष्ट करते हैं कि ज्योतिष जैसे गूढ़ और फलदायी शास्त्र का प्रतिपादन तभी संभव है जब साधक का अहंकार विनम्रता में विलीन हो जाए। वे वाग्देवी से आरंभ करके ईश्वर तक, और अपने पूर्वज आचार्यों से लेकर ग्रहों तक, सभी स्रोतों को नमन करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि ज्योतिषी केवल एक माध्यम है; वास्तविक ज्ञान परंपरा और दैवी कृपा से ही प्रवाहित होता है। बिना इस समर्पण के, शास्त्र का ज्ञान केवल बौद्धिक भार बनकर रह जाता है, फलदायी दीपक नहीं।
इस श्लोक में 'संक्षिप्य' शब्द पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। मन्त्रेश्वर कहते हैं कि वे विशालकाय वेदों और पुराणों में बिखरे हुए ज्योतिष सिद्धांतों, विशेषकर पराशर ऋषि की वाणी को, आधुनिक युग की आवश्यकता के अनुसार संक्षिप्त और स्पष्ट करेंगे। उनका उद्देश्य पांडित्य का प्रदर्शन नहीं, बल्कि 'सुविमला' अर्थात अत्यंत स्वच्छ और स्पष्ट ज्ञान प्रदान करना है, जिससे ज्योतिषीजन और साधक दोनों का कल्याण हो। यह दर्शाता है कि सच्चा शास्त्र वह है जो जटिलताओं को हटाकर सत्य के मूल स्वरूप को सरलता से प्रकट करे।
चिंतन आज के दिन किसी भी नए कार्य या अध्ययन को आरंभ करने से पूर्व, क्षण भर के लिए मौन होकर उन सभी स्रोतों को मानसिक प्रणाम करें जिनसे वह ज्ञान आपको प्राप्त हुआ है। चाहे वह आपके माता-पिता हों, आपके शिक्षक हों, या वह पुस्तक जिससे आप सीख रहे हों। इस छोटे से आभार के क्षण में अपने 'मैं' के अहंकार को छोड़ दें और स्वयं को एक खाली पात्र की भांति अनुभव करें। इस विनम्रता के साथ ही आपका दिन का कार्य केवल एक यांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक पवित्र यज्ञ बन जाएगा।
A contemplative reading in the spirit of the Jyotish — classical Vedic astrology tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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