Verse 1.3
कथं ब्रह्माण्डमुत्पन्नं कथं वा परिवर्तते । कथं विलीयते देव वद ब्रह्माण्डनिर्णयम्
Personalised to your chart
अनुवाद हे देव, बताइए कि यह ब्रह्मांड कैसे उत्पन्न हुआ, कैसे परिवर्तित होता रहता है और कैसे लीन हो जाता है; कृपया ब्रह्मांड के निश्चित तत्व को स्पष्ट करें।
अर्थ यह श्लोक सृष्टि के मूल रहस्य को जानने की तीव्र जिज्ञासा को व्यक्त करता है। यहाँ 'देव' से तात्पर्य केवल बाह्य देवता से नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना या शिव तत्व से है जो प्राणों के माध्यम से बोध कराता है। प्रश्नकर्ता सृष्टि के उत्पत्ति, स्थिति और लय के चक्र को समझना चाहता है, जो स्वरोदय शास्त्र के अनुसार बाह्य विश्व में नहीं, बल्कि मानव शरीर में बहने वाली प्राण वायु या श्वास के प्रवाह में छिपा है।
स्वरोदय के दर्शन में ब्रह्मांड और व्यक्ति का शरीर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जिस प्रकार सूर्य और चंद्रमा की गति से ऋतुएँ बदलती हैं, उसी प्रकार इड़ा और पिंगला नाड़ियों में श्वास के प्रवाह से जीवन की घटनाएँ घटित होती हैं। जब श्वास का प्रवाह बदलता है, तो हमारी मानसिक अवस्था, कार्य और यहाँ तक कि भाग्य भी परिवर्तित होते हैं। अतः ब्रह्मांड का निर्णय या सत्य बाहर खोजने में नहीं, बल्कि अपनी ही श्वास की गति और दिशा को पहचानने में निहित है।
चिंतन आज दिन भर में जब भी आप किसी निर्णय लेने वाले क्षण में हों या किसी जटिल स्थिति का सामना कर रहे हों, तो तुरंत बाह्य परिस्थितियों का विश्लेषण करने के बजाय एक क्षण के लिए रुककर अपनी श्वास पर ध्यान दें। देखें कि श्वास किस नासिका से प्रवाहित हो रही है और उसका प्रवाह कैसा है। इस सरल अवलोकन के माध्यम से यह समझने का प्रयास करें कि आपकी वर्तमान आंतरिक ऊर्जा की स्थिति आपकी बाह्य वास्तविकता को कैसे आकार दे रही है, और फिर उसी श्वास के अनुरूप अपना कार्य करें।
A contemplative reading in the spirit of the Swarodaya — the yoga of the breath tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
Get your free birth chart →
Sign in and the readings shift to your own placements.
Go deeper
Sign in to ask your own questions of this verse — answered
in its light, and in the light of your chart.
Sign in →
Drag to pan · scroll to zoom · click a node to open it