Sutra 1.11
त्रितय भोक्ता वीरेशः
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अनुवाद तीनों (जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति) का भोक्ता वीरेश है।
अर्थ यह सूत्र उस परम चेतना की ओर संकेत करता है जो तीनों अवस्थाओं—जाग्रत, स्वप्न और गहरी नींद—का साक्षी और अनुभव करने वाला है। 'वीरेश' शब्द में 'वीर' का अर्थ है वह योगी जिसने अपनी आंतरिक शक्ति को पहचान लिया है और 'ईश' का अर्थ है स्वामी या ईश्वर। अतः यह सूत्र बताता है कि जब साधक इन तीनों सीमित अवस्थाओं से परे जाकर उस एक अखंड चेतना में स्थित हो जाता है, तो वह स्वयं वीरेश बन जाता है। वह न केवल इन अवस्थाओं को देखता है, बल्कि उनका संपूर्ण उपभोग भी करता है, बिना किसी में फंसे या लिप्त हुए।
काश्मीर शैवमत के अनुसार, सामान्य मनुष्य इन तीनों अवस्थाओं में भटकता रहता है और स्वयं को शरीर या मन समझ लेता है, जबकि वीरेश वह है जिसने पहचान लिया है कि ये अवस्थाएं उसके भीतर आती-जाती हैं, पर वह स्वयं उनसे अलग और सर्वव्यापी है। यह 'भोक्ता' होना किसी इंद्रिय द्वारा वस्तुओं का उपभोग करना नहीं है, बल्कि पूरे अस्तित्व के नाटक को अपनी ही चेतना में खेलते हुए देखना है। जब व्यक्ति इस सत्य को साक्षात्कार करता है, तो वह भेदभाव का अंत कर देता है और शिव के समान स्वतंत्र हो जाता है।
चिंतन आज के दिन में जब भी आप किसी गहरी नींद से जागें, कोई सपना याद आए, या जाग्रत अवस्था में किसी तीव्र भावना का अनुभव करें, तो तुरंत रुककर स्वयं से पूछें: 'यह अनुभव किसके सामने घटित हो रहा है?' इस प्रश्न के माध्यम से ध्यान को उस व्यक्तिगत 'मैं' से हटाकर उस विस्तृत चेतना पर ले जाएं जो इन सभी बदलते हुए दृश्यों को देख रही है। क्षण भर के लिए उस 'देखने वाले' में स्थिर हो जाएं और महसूस करें कि आप वह सीमित अनुभव नहीं, बल्कि उस अनुभव को जानने वाले वीरेश हैं।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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