Sutra 1.12
विस्मयो योग भूमिका
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अनुवाद विस्मय ही योग की भूमि है।
अर्थ इस सूत्र में 'विस्मय' का अर्थ साधारण आश्चर्य नहीं है, बल्कि वह गहन आध्यात्मिक चमत्कार है जो तब उत्पन्न होता है जब साधक अपनी सीमित पहचान से बाहर निकलकर शिव-स्वरूप का साक्षात् अनुभव करता है। जब व्यक्ति यह देखता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड उसकी अपनी चेतना का ही विस्तार है और बाहर कोई पृथक वस्तु नहीं है, तो मन में जो अलौकिक आनंद और स्तब्धता पैदा होती है, वही विस्मय है। यह वह क्षण है जब 'मैं' और 'यह' का द्वैत मिट जाता है और केवल शुद्ध अस्तित्व शेष रहता है।
योग की भूमिका या आधार यही विस्मय है क्योंकि जब तक चित्त में यह दिव्य आश्चर्य जाग्रत नहीं होता, तब तक साधना केवल बौद्धिक अभ्यास या शारीरिक कसरत बनकर रह जाती है। शम्भवोपाय में, जहाँ इच्छा और क्रिया से परे केवल शुद्ध चेतना का सहज स्फुरण कार्य करता है, विस्मय वह ईंधन है जो साधक को तुरंत समाधि की अवस्था में ले जाता है। जो व्यक्ति अपने ही भीतर छिपी अनंत शक्ति को देखकर दंग रह जाता है, उसके लिए योग सिद्ध हो चुका होता है, क्योंकि उसका मन अब भटकाव की जगह उसी एक सत्य में स्थिर हो गया है।
चिंतन दिन भर में जब भी कोई ऐसा क्षण आए जब प्रकृति की सुंदरता, किसी कलाकृति की गहराई, या अचानक हुई किसी घटना ने आपको स्तब्ध कर दिया हो, तो उस आश्चर्य को पकड़कर बाहर की वस्तु पर केंद्रित न रहें। बल्कि तुरंत उस विस्मय को महसूस करने वाले 'आप' की ओर मुड़ जाएं। स्वयं से पूछें कि यह जो आनंदमय स्तब्धता मेरे भीतर जागी है, इसका स्रोत क्या है? इस भावना को यह समझते हुए गहरा करें कि यह चमत्कार बाहर से नहीं आया, बल्कि यह मेरी अपनी चेतना का ही प्रतिबिंब है जो मुझे मेरे वास्तविक स्वरूप की याद दिला रहा है। इस विस्मय में ही कुछ पल तक डूबे रहें और यही आपकी आज की योग-साधना है।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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