Sutra 1.14
दृश्य शरीरम्
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अनुवाद दृश्य ही शरीर है।
अर्थ इस सूत्र में 'दृश्य' से तात्पर्य बाह्य जगत की वस्तुओं, रूपों और परिदृश्यों से है, जिन्हें हम अपनी इंद्रियों द्वारा ग्रहण करते हैं। सामान्यतः हम अपने शरीर को केवल मांस, अस्थि और रक्त से बना हुआ एक सीमित ढांचा मानते हैं, जो त्वचा की सीमा तक समाप्त हो जाता है। किंतु काश्मीर शैवमत के इस गहन दर्शन के अनुसार, जिस प्रकार हम अपने आंतरिक विचारों और भावनाओं को अपना मानते हैं, ठीक उसी प्रकार बाह्य जगत भी चेतना का ही एक विस्तारित रूप है। जब तक द्वैत का भ्रम बना रहता है, तब तक जगत 'बाहर' प्रतीत होता है, परंतु जब द्रष्टा और दृश्य के बीच की दीवार गिरती है, तो सम्पूर्ण दृश्यमान जगत ही साधक का विशाल शरीर बन जाता है।
यह सिद्धांत शम्भवोपाय की उस उच्च अवस्था की ओर संकेत करता है जहाँ व्यक्तिगत अहंकार का संकुचित घेरा टूट जाता है। यहाँ शरीर की परिभाषा बदल जाती है; अब यह केवल जैविक इकाई नहीं रह जाती, बल्कि यह सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति बन जाती है। पर्वत, नदियाँ, वृक्ष और अन्य प्राणी अब 'मेरे' से अलग नहीं हैं, बल्कि वे शिव की चेतना के ही स्पंदन हैं जो इस विशाल कायिक रूप में प्रकट हुए हैं। इस अनुभव में जगत को देखना स्वयं को देखने जैसा हो जाता है, क्योंकि दृश्य और द्रष्टा दोनों एक ही तत्व के दो पहलू सिद्ध होते हैं।
चिंतन आज जब आप बाहर निकलें और किसी वस्तु, पेड़ या व्यक्ति को देखें, तो क्षण भर के लिए यह विचार करें कि यह दृश्य आपके अपने ही विस्तृत शरीर का अंग है। जैसे आप अपने हाथ या पैर को चोट लगने पर दर्द महसूस करते हैं, वैसे ही इस दृश्य जगत के प्रति एक गहरी आत्मीयता और एकत्व का भाव रखें। जब भी कोई बाह्य दृश्य आपके सामने आए, तो मन में दृढ़ता से यह अनुभव करें कि 'यह मुझसे अलग नहीं है, यह मेरा ही विशाल रूप है', और इस भावना के साथ अपने दिन के कार्यों को करें।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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