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Prathama Unmesa — Shambhavopaya

Sutra 1.19

शक्ति सन्धाने शरीरोत्पत्तिः

अनुवाद शक्ति के साथ एकाग्र संयोजन या गहन मिलन होने पर शरीर की उत्पत्ति होती है।

अर्थ इस सूत्र में भगवान शिव यह बता रहे हैं कि हमारा यह स्थूल शरीर केवल माता-पिता से जन्मित जड़ पदार्थ नहीं है, बल्कि यह चेतना की शक्ति का ही एक संघनित रूप है। जब परम चेतना अपनी स्वतंत्र इच्छाशक्ति (स्वातंत्र्य शक्ति) के माध्यम से स्वयं को सीमित करने का संकल्प करती है, तो वह 'सन्धान' अर्थात गहन एकाग्रता की अवस्था में प्रवेश करती है। इसी दिव्य ध्यान या शक्ति के संकुचन की प्रक्रिया से शरीर का आविर्भाव होता है। अतः शरीर चेतना से पृथक कोई वस्तु नहीं, बल्कि शक्ति का ही एक विशिष्ट कंपन या अभिव्यक्ति है।

साधारण मनुष्य शरीर को भोग का साधन या बाधा मानकर उसमें लिप्त हो जाता है, जबकि योगी इस सत्य को पहचानता है कि शरीर स्वयं शक्ति का खेल है। 'सन्धान' शब्द यहाँ केवल मिलन नहीं, बल्कि उस परम शक्ति के साथ अपनी पहचान को जोड़े रखने की निरंतर प्रक्रिया को दर्शाता है। जब तक हम इस बात से अनजान हैं कि शरीर शक्ति का ही प्रकाश है, तब तक हम बंधन में हैं। जैसे ही हमें यह बोध होता है कि मेरा अस्तित्व और मेरा शरीर उसी एक शक्ति का स्पंदन है, तो शरीर बंधन का कारण नहीं, बल्कि शिवत्व को प्रकट करने का माध्यम बन जाता है।

चिंतन दिन भर में जब भी आप अपने शरीर की अनुभूति करें—चाले चलते समय, बैठते समय या किसी वेदना या सुख को महसूस करते समय—तो तुरंत रुककर यह विचार करें कि यह संवेदना जड़ मांस नहीं, बल्कि जीवंत चेतना शक्ति का ही नाच है। मन में दृढ़तापूर्वक यह भाव लाएं कि 'यह शरीर मेरा नहीं है, बल्कि यह शक्ति का ही प्रकाशित रूप है जो अभी जाग रहा है।' इस दृष्टि के साथ अपनी श्वासों को देखें और अनुभव करें कि कैसे अदृश्य शक्ति ही दृश्य शरीर बनकर स्पंदित हो रही है।

A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.

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