Sutra 1.21
शुद्ध विद्योदयाच्चकेशत्व सिद्धिः
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अनुवाद शुद्ध विद्या के उदय से चकेशत्व की सिद्धि होती है।
अर्थ यह सूत्र बताता है कि जब अंदर की मलिनता धुल जाती है और 'शुद्ध विद्या' का उदय होता है, तब साधक को 'चकेशत्व' की प्राप्ति होती है। शुद्ध विद्या का अर्थ है वह निर्मल चेतना जो द्वैत के सभी भ्रमों से मुक्त होकर स्वयं को शिव के रूप में पहचानती है। यह कोई नई जानकारी नहीं है जो बाहर से आए, बल्कि यह आत्म-प्रकाश है जो तब जागृत होता है जब मन के संस्कार और अज्ञान का आवरण हट जाता है।
चकेशत्व का अर्थ है चक्रों का स्वामी बनना। सामान्य अवस्था में जीव चक्रों (संवेदनाओं, विचारों, और इंद्रियों के समूहों) द्वारा संचालित होता है और उनकी गिरफ्त में रहता है। लेकिन जब शुद्ध विद्या जागती है, तो संबंध उलट जाता है। अब चेतना चक्रों की दास नहीं, बल्कि उनकी नियंत्रक और स्वामिनी बन जाती है। जिस प्रकार एक राजा अपने राज्य के विभिन्न विभागों को संचालित करता है पर उनसे लिप्त नहीं होता, वैसे ही सिद्ध योगी अपने आंतरिक और बाह्य चक्रों को अपनी इच्छाशक्ति से संचालित करता है, बिना उनमें फंसे।
चिंतन आज के दिन जब भी आप किसी तीव्र भावना, बार-बार आने वाले विचार, या इंद्रिय के वेग को महसूस करें, तो तुरंत रुकें और यह न सोचें कि 'मैं यह महसूस कर रहा हूँ'। इसके बजाय, एक क्षण के लिए उस अनुभव के पीछे बैठे उस साक्षी को पहचानें जो इसे देख रहा है। स्वयं से दृढ़ता से कहें, 'मैं इस चक्र का भाग नहीं, मैं इसके स्वामी हूँ।' इस छोटे से अंतराल में देखें कि कैसे पहचान का बदलना उस भावना या विचार की पकड़ को ढीला कर देता है और आपको केंद्रित शक्ति का अनुभव कराता है।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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