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Prathama Unmesa — Shambhavopaya

Sutra 1.3

योनिवर्गः कला शरीरम्

अनुवाद योनि का समूह (अर्थात सृष्टि के सभी बीज या तत्व) कलाएं हैं, और शरीर उन्हीं कलाओं से निर्मित है।

अर्थ इस सूत्र में भगवान शिव यह बता रहे हैं कि हमारा स्थूल शरीर कोई अलग या स्वतंत्र वस्तु नहीं है, बल्कि यह मातृक शक्तियों अर्थात वर्णों और ध्वनियों का ही एक संघटन है। 'योनिवर्ग' से तात्पर्य उन मूल बीजाक्षरों से है जिनसे संपूर्ण सृष्टि अभिव्यक्त होती है। ये बीजाक्षर केवल लिखित प्रतीक नहीं हैं, बल्कि चेतना की स्पंदन शक्तियां हैं जिन्हें 'कला' कहा गया है। अतः शरीर जड़ पदार्थ का पुंज नहीं, बल्कि चेतना की ही एक लयबद्ध अभिव्यक्ति है जो इन कलाओं के मिलन से रूप लेती है।

जब साधक यह समझ लेता है कि उसका शरीर वास्तव में शिव की शक्तियों (कलाओं) का ही विस्तार है, तो शरीर के प्रति उसका दृष्टिकोण बदल जाता है। अब शरीर बंधन का कारण नहीं, बल्कि शिवत्व को प्रकट करने का एक पवित्र यंत्र बन जाता है। त्रिक दर्शन में यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि जगत और शरीर चेतना से पृथक नहीं हैं; वे चेतना की ही खेल-शक्ति हैं जो विभिन्न रूपों में नाच रही हैं। इस दृष्टि से देखने पर सीमित देह-बुद्धि टूटती है और विस्तृत शिव-भावना जागृत होती है।

चिंतन दिन भर में जब भी आप अपने शरीर को देखें या महसूस करें, तो यह विचार करें कि यह मांस और हड्डियों का ढांचा नहीं, बल्कि दिव्य ध्वनियों और प्रकाश की कलाओं से बुना हुआ एक जीवंत मंदिर है। श्वास लेते समय यह भावना रखें कि हर सांस के साथ ये शक्तियां आपके भीतर नाच रही हैं और आपका शरीर साक्षात चेतना का ही एक रूप है। इस भाव के साथ चलें कि शरीर के माध्यम से शिव ही स्वयं को अनुभव कर रहे हैं।

A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.

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