Sutra 1.6
शक्तिचक्रसन्धाने विश्वसंहारः
Personalised to your chart
अनुवाद शक्तिचक्र के साथ एकात्मक होने में या उसके स्वरूप को पहचानने में ही इस विश्व का संहार (अर्थात् भेदभावपूर्ण प्रपंच का विलय) होता है।
अर्थ यह सूत्र शम्भोपाय के मार्ग पर चलने वाले साधक के लिए मूलभूत सिद्धांत है। यहाँ 'शक्तिचक्र' से तात्पर्य चेतना की उन अगणित शक्तियों से है जो इस सृष्टि को बनाए रखती हैं और जिनके द्वारा हम संसार को अनुभव करते हैं। सामान्य अवस्था में मनुष्य इन शक्तियों को अपने से अलग मानकर बाहरी वस्तुओं में लिप्त हो जाता है, जिससे द्वैत का भ्रम पैदा होता है। जब साधक इस तथ्य को सीधे अनुभव कर लेता है कि ये सभी शक्तियाँ उसकी अपनी चेतना (शिव) का ही विस्तार हैं और उनमें कोई पृथक अस्तित्व नहीं है, तो वह 'सन्धान' या एकीकरण की अवस्था में पहुँच जाता है।
इस एकीकरण की घटना में ही 'विश्वसंहार' घटित होता है। यहाँ संहार का अर्थ भौतिक दुनिया का विनाश नहीं है, बल्कि उस मानसिक संरचना का टूट जाना है जो जगत को 'मेरे से अलग' किसी बाहरी सत्य के रूप में प्रक्षेपित करती है। जैसे ही शक्तिचक्र को अपने ही स्वरूप के रूप में पहचान लिया जाता है, वैसे ही वस्तुओं का पृथक अस्तित्व मिट जाता है और केवल अद्वैत शिव-तत्त्व शेष रह जाता है। यह प्रपंच का विलय नहीं, बल्कि प्रपंच के प्रति दृष्टिकोण का पूर्ण परिवर्तन है, जहाँ बहुतायत एकता में लीन हो जाती है।
चिंतन दिन भर में जब भी आप किसी तीव्र भावना, विचार या बाहरी घटना से अभिभूत हों, तो क्षण भर के लिए रुकें और स्वयं से पूछें कि यह अनुभव किस शक्ति के द्वारा हो रहा है। इसके बाद यह गहरा निश्चय करें कि यह शक्ति आपसे अलग कोई वस्तु नहीं, बल्कि आपकी अपनी चेतना की ही एक लहर है। जैसे ही आप इस भावना को अपनाकर भीतर से उसे गले लगाते हैं और यह कहते हैं कि 'यह मैं ही हूँ', तो उस विचार या भावना का पृथक बोझ हल्का हो जाएगा और वह विशाल चेतना के सागर में विलीन होती हुई प्रतीत होगी। इस प्रकार हर अनुभव को अलग-थलग समस्या मानने के बजाय, उसे अपनी ही शक्ति का खेल जानकर देखें।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
Get your free birth chart →
Sign in and the readings shift to your own placements.
Go deeper
Sign in to ask your own questions of this sutra — answered
in its light, and in the light of your chart.
Sign in →
Drag to pan · scroll to zoom · click a node to open it