Sutra 1.7
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिभेदे तुर्याभोगसम्भवः
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अनुवाद जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं के भेद में ही चौथी अवस्था (तुर्य) का भोग या अनुभव संभव होता है।
अर्थ यह सूत्र हमें इस भ्रम से मुक्त करता है कि तुर्य या शुद्ध चैतन्य की अवस्था इन तीन सामान्य अवस्थाओं से अलग कहीं दूर स्थित है। वास्तव में, जाग्रत (जागने की), स्वप्न (सपने देखने की) और सुषुप्ति (गहरी नींद की) अवस्थाएं स्वयं उस एक अखंड चैतन्य की ही अभिव्यक्तियां हैं। जब साधक इन तीनों अवस्थाओं के बीच के भेदों को गहराई से विचारता है और देखता है कि इन सभी में जो 'देखने वाला' या साक्षी भाव निरंतर बना हुआ है, वही तुर्य है, तो उसे एहसास होता है कि तुर्य इन अवस्थाओं से पृथक नहीं, बल्कि इनका आधार और सार है।
शैव दर्शन के अनुसार, तुर्य कोई नई अवस्था नहीं है जिसे प्राप्त करना हो, बल्कि यह इन तीनों अवस्थाओं का रस या सार है। जैसे सोना आभूषणों के विभिन्न रूपों में छिपा होता है, वैसे ही तुर्य चैतन्य जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के रूपों में विद्यमान है। जब व्यक्ति इन अवस्थाओं के बदलते स्वरूपों के पीछे छिपे अपरिवर्तनीय साक्षी को पहचान लेता है, तो प्रत्येक क्षण में, चाहे वह जागने का हो या सोने का, तुर्य का आनंदमय भोग स्वतः ही प्रकट हो जाता है। भेद ही अभेद का द्वार बन जाता है।
चिंतन आज के दिन में जब भी आपकी अवस्था बदले—जैसे नींद से जागने पर, दिन भर की व्यस्तता में, या शाम को थकान के कारण गहरे विश्राम की ओर झुकने पर—तो रुककर स्वयं से पूछें: 'इन बदलती हुई अवस्थाओं को कौन जान रहा है?' यह न खोजें कि आप क्या महसूस कर रहे हैं, बल्कि उस 'जागरूकता' को पहचानें जो इन सभी बदलावों के बावजूद स्थिर और अटल बनी हुई है। इस स्थिर साक्षी भाव में थोड़ी देर ठहरना ही तुर्य का भोग है।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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