Sutra 2.1
अनुवाद चित्त ही मन्त्र है।
अर्थ इस सूत्र का तात्पर्य यह है कि बाह्य शब्दों या ध्वनियों में मन्त्र की शक्ति निहित नहीं है, बल्कि वह शुद्ध चेतना के उस कंपन में है जिसे हम चित्त कहते हैं। सामान्य अवस्था में चित्त विचारों, संस्कारों और द्वंद्वों से आच्छादित रहता है, परंतु जब साधक अपनी आंतरिक दृष्टि को जाग्रत करता है, तो उसे अनुभव होता है कि चित्त का मूल स्वरूप ही शिव की शक्ति (शक्तिपात) से स्पंदित एक सजीव मन्त्र है। यहाँ 'मन्त्र' का अर्थ केवल जप करने वाला शब्द नहीं, बल्कि वह तत्व है जो मन को रक्षित करता है और उसे सीमित पहचान से मुक्त करके परम शिव से मिलाता है।
शक्तोपाय के इस मार्ग में साधक को बाह्य अनुष्ठानों या कठोर तपस्या की अपेक्षा अपने ही चेतना-तत्व पर ध्यान केंद्रित करना होता है। जब चित्त अपनी विकल्पों (विकल्पोँ) और भेद-भाव की वृत्तियों से मुक्त होकर केवल शुद्ध 'अहं' या 'चिद्' में स्थिर होता है, तो वह स्वतः ही मन्त्र बन जाता है। इस अवस्था में विचार करने वाला और विचार का विषय एक हो जाते हैं, और चित्त का प्रत्येक स्पंदन शिव के स्वातंत्र्य का प्रकटीकरण बन जाता है। यह समझना आवश्यक है कि मन्त्र कोई बाह्य उपकरण नहीं है जिसे हम प्राप्त करें, बल्कि हमारा अपना चित्त ही वह दिव्य वाहन है जो हमें परम सत्य तक ले जाता है, बशर्ते हम उसकी वास्तविक प्रकृति को पहचान लें।
चिंतन आज के दिन जब भी कोई विचार मन में उठे या कोई बाह्य ध्वनि सुनाई दे, तो तुरंत उस विषय पर ध्यान देने के बजाय उस 'चित्त' या चेतना की ओर लौटें जिसमें वह विचार या ध्वनि प्रतिबिंबित हो रही है। स्वयं से यह प्रश्न करें कि 'यह जानने वाला कौन है?' और उस जानने की प्रक्रिया में ही विश्राम करें, यह मानते हुए कि आपका चित्त स्वयं एक सजीव मन्त्र है जो निरंतर शिव-स्वरूप का गुंजन कर रहा है। किसी विशेष मन्त्र के जप की प्रतीक्षा किए बिना, अपने चित्त की शुद्ध उपस्थिति को ही अपना मुख्य साधन बनाएं और देखें कि कैसे बाह्य कोलाहल के बीच भी आंतरिक स्थिरता बनी रहती है।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.