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Dvitiya Unmesa — Shaktopaya

Sutra 2.10

विद्या संहारे तदुत्थ स्वप्न दर्शनम्

अनुवाद विद्या का संहार (अंत या विलीन होना) होने पर, उसी से उत्पन्न स्वप्न का दर्शन होता है।

अर्थ इस सूत्र में 'विद्या' से तात्पर्य भेद-बुद्धि या सीमित ज्ञान की शक्ति है जो हमें यह भ्रम देती है कि हम शिव से अलग हैं। 'संहार' यहाँ विनाश नहीं, बल्कि उस भेद-बुद्धि का लय होना या पीछे हट जाना है। जब जाग्रत अवस्था में कार्य करने वाली यह भेदक शक्ति अपने स्वरूप में विलीन हो जाती है, तो चेतना बाह्य विषयों से हटकर अपने भीतर की ओर मुड़ती है। इस आंतरिक मुड़ाव की अवस्था ही स्वप्न लोक का द्वार है, जहाँ बाह्य इंद्रियों का संपर्क टूट जाता है लेकिन चेतना जागृत रहती है।

यहाँ 'स्वप्न दर्शन' केवल रात में आने वाले सपनों की बात नहीं कर रहा, बल्कि शाक्तोपाय के मार्ग पर चेतना की उस सूक्ष्म अवस्था की ओर संकेत है जहाँ वास्तविकता मन की शक्ति से निर्मित होती है। जब बाह्य जगत का कठोरपन (जाग्रत अवस्था) शिथिल होता है, तो योगी उस शक्ति (शक्ति) को प्रकट होते हुए देखता है जो सृजन करती है। यह अनुभव इस तथ्य को उजागर करता है कि जिस प्रकार स्वप्न में हमारा मन ही पूरा जगत रचता है, उसी प्रकार यह जाग्रत जगत भी परम चेतना की शक्ति का ही एक विस्तार है। यह दृष्टि साधक को यह बोध कराती है कि द्रष्टा और दृश्य दोनों एक ही चैतन्य शक्ति के खेल हैं।

चिंतन दिन भर में जब भी आप किसी गहरे विचार या कल्पना में खो जाएं और बाह्य शोर क्षण भर के लिए मद्धिम पड़ जाए, तो तुरंत रुककर उस क्षण को पहचानें। इस बात का साक्षी बनें कि कैसे आपके भीतर की शक्ति ने बिना किसी बाह्य वस्तु के एक पूरा दृश्य या भावना रच दी है। इस छोटे से 'स्वप्न' को देखते हुए स्वयं से पूछें: 'जिस शक्ति ने यह क्षणिक जगत रचा, क्या वही शक्ति इस ठोस लगने वाले संसार को भी नहीं रच रही?' इस प्रतिपल के अवलोकन से आप भेद की दीवार को पतला करते हुए उस एक चेतना की ओर बढ़ेंगे जो सभी अवस्थाओं में विद्यमान है।

A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.

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