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Dvitiya Unmesa — Shaktopaya

Sutra 2.6

गुरुपायः

अनुवाद गुरु ही (सिद्धि का) उपाय है।

अर्थ इस सूत्र में शक्तिोपाय के मार्ग पर चलने वाले साधक के लिए गुरु की अनिवार्यता और उनकी दिव्य स्थिति को स्पष्ट किया गया है। जब साधक की अपनी आंतरिक शक्ति (शक्ति) पूर्ण रूप से जागृत नहीं हुई होती और वह स्वयं के प्रयास से उस परम अवस्था तक नहीं पहुँच पा रहा होता, तब गुरु कृपा रूपी शक्ति बनकर उसका मार्ग प्रशस्त करते हैं। यहाँ 'गुरु' केवल एक शारीरिक शिक्षक नहीं, बल्कि वह सजीव माध्यम हैं जिनके через शिव की चेतना सीधे शिष्य में प्रवाहित होती है। गुरु वह सेतु हैं जो सीमित व्यक्तिगत चेतना को विश्व चेतना से मिलाते हैं।

कश्मीर शैवमत के अनुसार, गुरु स्वयं शिव का ही एक रूप हैं जो अनुग्रह (अनुग्रह शक्ति) प्रदान करने के लिए प्रकट हुए हैं। जब साधक समर्पण भाव से गुरु के चरणों में अपना अहंकार समर्पित कर देता है, तो गुरु की दृष्टि या स्पर्श मात्र से ही उसकी मलिनताएं धुल जाती हैं और उसमें चमत्कारिक जागरण होता है। इस उपाय में साधक का अपना प्रयास गौण हो जाता है और गुरु की इच्छाशक्ति ही प्रधान हो जाती है; गुरु का मार्ग ही अब साधक का मार्ग बन जाता है, क्योंकि गुरु में ही वह शक्ति निहित है जो अज्ञान के अंधकार को तत्क्षण मिटा सकती है।

चिंतन आज के दिन के लिए यह अभ्यास करें कि किसी भी निर्णय या कार्य को करने से पूर्व, अपने आंतरिक अंतरिक्ष में अपने गुरु या उस दिव्य चेतना का स्मरण करें जिस पर आपका पूर्ण विश्वास है। जब भी मन में संदेह, भय या अहंकार का भाव उठे, तो तुरंत उस भाव को अपने गुरु के चरणों में अर्पित करने की मानसिक क्रिया करें और यह दृढ़ संकल्प लें कि 'मेरा प्रयास नहीं, केवल गुरु की कृपा ही इस स्थिति को संवार रही है।' इस समर्पण की भावना के साथ दिन भर के कार्यों को करें और देखें कि कैसे भारीपन हल्का होकर एक सहज प्रवाह में परिवर्तित हो जाता है।

A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.

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