Sutra 2.7
मातृका चक्र सम्बोधः
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अनुवाद मातृका चक्र का पूर्ण जागरण या प्रबुद्धता।
अर्थ यह सूत्र शक्ति उपाय के मार्ग पर एक गहन रहस्य को उजागर करता है, जहाँ 'मातृका' केवल वर्णमाला या शब्दों का समूह नहीं, बल्कि चेतना की वह मूल स्पंदन शक्ति है जो सृष्टि के सभी रूपों को अभिव्यक्त करती है। 'चक्र' यहाँ पहियों या समूहों का प्रतीक है, जो इस शक्ति के विस्तार और संकुचन की गतिशील प्रक्रिया को दर्शाता है। सामान्य अवस्था में जीव इन शब्द-रूपी ध्वनियों में बंधा होता है और उन्हें बाह्य वस्तुओं का बोधक मानता है, किंतु यहाँ 'सम्बोधः' शब्द का प्रयोग उस क्षण के लिए किया गया है जब साधक को अचानक यह प्रतीत होता है कि ये सभी ध्वनियाँ और विचार स्वयं शिव-शक्ति का ही नाट्य हैं।
इस जागरण का तात्पर्य है कि भाषा और विचारों की जड़ तक पहुँचना। जब मातृका चक्र का सम्बोधन होता है, तो शब्दों का भार हल्का हो जाता है और वे पारदर्शी हो जाते हैं। साधक यह देखने लगता है कि हर शब्द के पीछे छिपी ऊर्जा वही पराशक्ति है जो संविद् (चिति) से उत्पन्न हो रही है। यह केवल बौद्धिक समझ नहीं है, बल्कि एक अनुभूति है जहाँ शब्द और अर्थ का द्वैत विलीन होकर केवल एक चेतना का प्रवाह शेष रह जाता है। इस अवस्था में मन की वृत्तियाँ बाधक नहीं, बल्कि शिव के स्पंदन के साक्षी बन जाती हैं।
चिंतन आज के दिन जब भी आप किसी से बात करें या अपने भीतर कोई विचार उठे, तो तुरंत शब्दों के अर्थ में उलझने के बजाय एक क्षण रुकें। उस शब्द या विचार के पीछे मौजूद मूल ध्वनि और ऊर्जा को महसूस करने का प्रयास करें। जैसे ही कोई विचार आए, स्वयं से पूछें कि यह ध्वनि कहाँ से उठी और किस चेतना में लीन हो रही है? इस अभ्यास से आप शब्दों के गुलाम बनने के बजाय उन्हें अपनी चेतना में नाचते हुए देखेंगे, जिससे मातृका चक्र का धीरे-धीरे जागरण होने लगेगा।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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