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Tritiya Unmesa — Anavopaya

Sutra 3.1

आत्मा चित्तम्

अनुवाद आत्मा ही चित्त है।

अर्थ इस सूत्र में शिव बताते हैं कि हमारी वास्तविक पहचान, जो शुद्ध चेतना या आत्मा है, वही मन या चित्त का मूल स्रोत और स्वरूप है। सामान्य अवस्था में हमें लगता है कि चित्त विचारों, भावनाओं और संस्कारों का एक अस्थिर पुलिंदा है जो आत्मा से अलग चल रहा है, लेकिन तंत्र की दृष्टि में चित्त कोई पृथक वस्तु नहीं है। यह आत्मा की ही एक गतिशील शक्ति है जो स्वतंत्र इच्छा से संकुचित होकर सीमित अनुभव करती है और फिर विस्तार पाकर अपनी पूर्णता को पहचानती है।

जब तक चित्त बाह्य वस्तुओं में लिप्त रहता है, तब तक वह बंधन का कारण प्रतीत होता है, परंतु जैसे ही यह अपनी ओर मुड़ता है, इसका स्वरूप स्पष्ट हो जाता है कि यह स्वयं शिव की चेतना है। अतः साधना का उद्देश्य चित्त को नष्ट करना या दबाना नहीं, बल्कि यह पहचानना है कि जो सोच रहा है, जो जान रहा है और जो अनुभव कर रहा है, वह सब इसी एक अखंड चेतना का खेल है। आत्मा और चित्त के बीच की काल्पनिक खाई मिटते ही व्यक्ति अपने भीतर के दिव्य नाट्य को साक्षी भाव से देखने लगता है।

चिंतन दिन भर में जब भी कोई तीव्र विचार या भावना उठे, तो उसे रोकने या उसमें बहने के बजाय तुरंत रुकें और स्वयं से पूछें कि यह विचार किसमें उठ रहा है। इस प्रश्न के साथ अपने ध्यान को विचार की सामग्री से हटाकर उस पृष्ठभूमि या आकाश की ओर ले जाएं जहाँ यह विचार आ-जा रहा है। इस क्षणिक विराम में यह अनुभव करें कि विचार तो आते-जाते बादल हैं, लेकिन जिस चेतना में वे तैर रहे हैं, वही आपकी अटल आत्मा है और वही इस चित्त का वास्तविक रूप है।

A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.

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