Sutra 3.14
यथा तत्र तथाऽन्यत्र
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अनुवाद जैसा वहाँ है, वैसा ही अन्यत्र भी है।
अर्थ यह सूत्र उस अद्वैत दृष्टि की पुष्टि करता है जहाँ साधक को 'तत्र' अर्थात् उस विशेष अवस्था या स्थान में जो दिव्य चैतन्य का अनुभव हुआ है, वही चैतन्य 'अन्यत्र' अर्थात् सभी अन्य परिस्थितियों, स्थानों और वस्तुओं में भी व्याप्त है, इसका साक्षात्कार होता है। त्रिका दर्शन में यह बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण है कि शिव तत्व केवल समाधि की गहरी अवस्था में या किसी पवित्र स्थान तक सीमित नहीं है; वह सर्वव्यापी है। जब योगी की चेतना में यह उन्मेष या खुलना होता है, तो उसके लिए भेद मिट जाता है और उसे हर जगह, हर रूप में वही एक शिव-तत्व स्पंदित होता हुआ दिखाई देता है।
इसका तात्पर्य यह है कि वास्तविकता एक ही है और वह खंडित नहीं हो सकती। यदि चेतना एक जगह जाग्रत हुई है, तो वह सिद्धांततः हर जगह मौजूद है; केवल हमारी सीमित दृष्टि के कारण हमें वह अन्यत्र नहीं दिखती थी। इस सूत्र के माध्यम से आचार्य बताते हैं कि आनवोपाय की साधना का फल यह है कि साधक धीरे-धीरे अपनी सीमित पहचान से ऊपर उठकर उस सत्य को देखने लगता है जहाँ 'यहाँ' और 'वहाँ' का अंतर मिट जाता है। संसार का हर कोना, हर प्राणी और हर घटना उसी एक शिव का प्रकाश है, बस दृष्टिकोण के बदलने की आवश्यकता है।
चिंतन आज के दिन जब भी आपका ध्यान किसी विशेष सुखद अनुभव, शांति या सौंदर्य पर जाए जो आपको 'विशेष' लगे, तो तुरंत रुककर यह विचार करें कि यह वही तत्व है जो अभी आपके सामने की साधारण वस्तु में, शोरगुल में, या किसी कठिन परिस्थिति में भी मौजूद है। जानबूझकर उसी चेतना को उस 'अन्यत्र' के रूप में पहचानने का प्रयास करें। बार-बार स्वयं से कहें कि जैसी दिव्यता मैंने उस क्षण में देखी, वैसी ही दिव्यता इस पल में, इस स्थान पर और इस रूप में भी विद्यमान है, केवल पर्दा हटाने की देर है। इस अभ्यास से धीरे-धीरे जीवन के सभी खंडों में एक अखंड चैतन्य का अनुभव होने लगेगा।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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