Sutra 3.15
बीजावधानम्
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अनुवाद बीज पर एकाग्र चित्त होना।
अर्थ यह सूत्र अनुपयोग के मार्ग में एक सूक्ष्म और शक्तिशाली अवस्था की ओर संकेत करता है। 'बीज' यहाँ केवल मंत्र का ध्वनि-तत्व नहीं है, बल्कि वह मूल स्पंदन है जिससे संपूर्ण विश्व का विस्तार होता है। जब साधक अपने चित्त को इस मूल बीज में पूरी तरह से लीन कर देता है, तो वह विचारों की शाखाओं और पत्तियों से हटकर वृक्ष के मूल तक पहुँच जाता है। इस अवधान या एकाग्रता में, सीमित व्यक्तिगत अहंकार का विलय होने लगता है और चेतना अपने स्रोत की ओर लौटती है।
त्रिक दर्शन के अनुसार, बीज वह बिंदु है जहाँ शक्ति और शिव का अभेद वर्तमान होता है। जब हम बीज पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हम बाह्य वस्तुओं के प्रति बिखरी हुई ऊर्जा को भीतर समेटते हैं। यह प्रक्रिया यांत्रिक जप से भिन्न है; इसमें ध्वनि के बाहरी रूप से हटकर उसके आंतरिक कंपन और अर्थ-रहित शुद्ध अस्तित्व को महसूस करना शामिल है। इस एकाग्रता के माध्यम से, साधक उस 'अणु' या सीमित भावना को तोड़कर अनंत शिव-तत्व में प्रवेश करता है, जहाँ बीज और बीजी (जो बीज का उच्चारण करता है) के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है।
चिंतन आज के दिन में, जब भी आप किसी मंत्र का जाप करें या किसी कार्य को शुरू करें, तो केवल सतह पर न रुकें। उस शब्द या intention के पीछे छिपे उस पहले क्षण, उस मूल कंपन को पकड़ने का प्रयास करें। जैसे ही विचार आएं, उन्हें अनुसरण करने के बजाय वापस उस 'बीज' बिंदु पर ले आएं जहाँ से वे निकले थे। दिन में कई बार रुककर स्वयं से पूछें: 'क्या मेरा ध्यान अभी भी उस मूल स्रोत पर टिका है या मैं शाखाओं में भटक गया हूँ?' इस सरल लेकिन गहन अवधान को अपनी दिनचर्या का आधार बनाएं।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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