Sutra 3.17
स्व मात्रा-निर्माणमापादयति
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अनुवाद (जीवात्मा) अपनी ही मात्राओं (सीमित अनुभूतियों या तत्वों) का निर्माण करता है।
अर्थ इस सूत्र में भगवान शिव स्पष्ट करते हैं कि संकुचित जीव या पशु, जो अपनी वास्तविक स्वरूप से विस्मृत है, वह स्वयं अपने सीमित संसार की रचना करता है। 'मात्रा' यहाँ इंद्रियों के विषयों, भावनाओं और उन सीमित अनुभवों को संकेत करता है जो हमें लगता है कि बाहर से आ रहे हैं। वास्तव में, यह बाहरी जगत नहीं है जो हमें बांध रहा है, बल्कि हमारी अपनी चेतना का संकुचित रूप ही लगातार अपने आसपाद दुख और सीमाओं की दीवारें खड़ी कर रहा है।
त्रिक दर्शन के अनुसार, यह प्रक्रिया 'अणु' या सीमित जीव की मुख्य समस्या है। जब चेतना यह भूल जाती है कि वह स्वयं शिव है, तो वह अपनी ही शक्ति से छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटकर 'मैं' और 'यह' का भ्रम पैदा करती है। हम अपने ही विचारों, इच्छाओं और डर से ऐसा संसार गढ़ लेते हैं जिसमें हम कैद महसूस करते हैं। यह सूत्र हमें याद दिलाता है कि हमारे बंधन का निर्माता कोई बाहरी शक्ति नहीं, बल्कि हमारी अपनी ही भूलभुलैया में खोई हुई चेतना है।
चिंतन आज जब भी आप किसी कठिन परिस्थिति, डर या बाधा का सामना करें, तो तुरंत रुककर यह प्रश्न स्वयं से पूछें: 'क्या मैंने ही अपनी चेतना को संकुचित करके इस समस्या को जन्म दिया है?' बाहर दोष देने के बजाय, उस क्षण में यह देखने का प्रयास करें कि कैसे आपकी अपनी सीमित पहचान (अहंकार) ने इस अनुभव को 'वास्तविक' और 'कठोर' बना दिया है। इस जागरूकता के साथ कि निर्माता आप ही हैं, उस समस्या के प्रति अपना दृष्टिकोण बदल दें और जानें कि जिसने इसे बनाया, वही इसे विसर्जित भी कर सकता है।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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