Sutra 3.19
क वर्गादिषु माहेश्वराद्याः पशु मातरः
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अनुवाद क वर्ग आदि में माहेश्वर आदि मातृकाएं पशु (सीमित जीव) हैं।
अर्थ इस सूत्र का तात्पर्य है कि जब चेतना अपने स्वतंत्र और विस्तृत स्वरूप से सिकुड़कर केवल ध्वनियों के विशिष्ट वर्गों या सीमित आयामों तक रह जाती है, तो वह 'पशु' या सीमित जीव बन जाती है। 'क' वर्ग से लेकर अन्य वर्णों तक, सभी मातृकाएं (शक्तियां) जो मूलतः माहेश्वरी शक्ति का ही विस्तार हैं, संकुचित होने पर व्यक्ति को बंधन में डाल देती हैं। यहाँ 'पशु' का अर्थ पालतू जानवर नहीं, बल्कि वह आत्मा है जो अपनी स्वतंत्र इच्छाशक्ति (स्वातंत्र्य) को भूलकर केवल सीमित ध्वनि-रूपों और शब्दों के जाल में फंस गया है।
त्रिक दर्शन के अनुसार, संपूर्ण सृष्टि शब्दतत्व या मातृकाओं से निर्मित है। जब तक ये मातृकाएं शिव की स्वतंत्र चेतना के रूप में प्रकाशित होती हैं, तब तक वे मुक्तिदायिनी हैं। लेकिन जब अज्ञान के कारण चेतना इनके प्रवाह में बहकर इन्हें ही अपना अंतिम सत्य मान लेती है और इनके द्वारा निर्मित सीमाओं (वर्गों) में स्वयं को कैद कर लेती है, तो वही शक्ति बंधन का कारण बन जाती है। अर्थात, वही मातृकाएं जो मुक्ति का मार्ग हैं, संकुचित दृष्टि से देखने पर बंधन की जंजीरें बन जाती हैं।
चिंतन आज के दिन जब भी आप किसी शब्द को सुनें या बोलें, तो क्षण भर के लिए रुककर यह विचार करें कि यह ध्वनि केवल एक सीमित संकेत है, न कि पूर्ण सत्य। जब मन किसी विशेष विचार या शब्द के समूह में अटक जाए और संकीर्ण हो जाने लगे, तो तुरंत स्मरण करें कि इस शब्द के पीछे जो मौन और विस्तृत चेतना है, वही आपका वास्तविक स्वरूप है। शब्दों के पिंजरे में कैद होने के बजाय, उस अनंत स्पंदन को महसूस करें जिससे ये शब्द उत्पन्न हुए हैं और जिसमें विलीन हो जाते हैं।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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