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Tritiya Unmesa — Anavopaya

Sutra 3.20

त्रिषु चतुर्थं तैलं वदासेच्यम्

अनुवाद तीनों (अर्थात् इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों) में चौथा (तत्त्व अर्थात् शुद्ध संविद् या शिवत्व) तेल की भांति सिंचित किया जाना चाहिए।

अर्थ इस सूत्र में 'तीन' से तात्पर्य आत्मा की तीन मूल शक्तियों से है: इच्छा (कामना करना), ज्ञान (जानना) और क्रिया (करना)। सामान्य अवस्था में जीव इन तीनों को पृथक-पृथक और सीमित मानकर चलता है, जिससे द्वैत का भ्रम बना रहता है। 'चौथा' कोई अलग तत्व नहीं है, बल्कि वह अद्वैत चेतना है जो इन तीनों के पार और इन तीनों के आधार के रूप में विद्यमान है। यह चौथा तत्व शिव का स्वरूप है, जो सभी क्रियाओं का साक्षी और स्रोत है।

तेल का उदाहरण यहाँ अत्यंत सार्थक है। जिस प्रकार तेल तीन अलग-अलग पदार्थों को मिलाने पर भी उनमें लिप्त हुए बिना एक सतत और अखंड धारा बनाए रखता है, उसी प्रकार साधक को अपनी इच्छा, ज्ञान और क्रिया में उस अखंड चेतना का संचार करना है। जब इन तीनों शक्तियों में चौथे तत्व (शिव-चैतन्य) का निरंतर आसेचन या सिंचन होता है, तो सीमित कर्तृत्व मिट जाता है और समस्त जीवन की गतिविधियाँ शिव की लीला बन जाती हैं। यह अनुभव ही त्रिका दर्शन का सार है जहाँ भेद विलीन होकर अखंड एकत्व प्रकट होता है।

चिंतन आज के दिन जब भी आप कोई कार्य करें, कोई विचार करें या कोई इच्छा रखें, तो रुककर यह महसूस करें कि इन तीनों के पीछे कौन सी अटूट चेतना बह रही है। कल्पना करें कि आपके भीतर से एक सुनहरे तेल की भांति शुद्ध संविद् की धारा प्रवाहित हो रही है, जो आपकी हर सांस, हर विचार और हर हाथ के इशारे को एक सूत्र में पिरो रही है। यह न सोचें कि 'मैं कर रहा हूँ', बल्कि यह अनुभव करें कि शिव-चैतन्य का वह तेल आपकी इच्छा, ज्ञान और क्रिया को लगातार सींच रहा है, जिससे आपका अस्तित्व एक अखंड और मधुर प्रवाह बन गया है।

A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.

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