Sutra 3.23
मध्येऽवरः प्रसवः
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अनुवाद मध्य में अधम (निम्न स्तर का) प्रसव या उत्पत्ति होती है।
अर्थ इस सूत्र में 'मध्य' से तात्पर्य उस संकुचित चेतना की अवस्था से है जहाँ व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर, मन या बुद्धि तक सीमित मान लेता है। जब चेतना इस मध्यम स्तर पर स्थिर हो जाती है और अपने वास्तविक स्वरूप, अर्थात् शिवत्व से विमुख हो जाती है, तो वहाँ से 'अवर प्रसव' अर्थात् निम्न कोटि की उत्पत्ति होती है। यह उत्पत्ति द्वैत, भेदभाव, राग-द्वेष और कर्म के बंधनों की शृंखला है, जो जीव को बार-बार संसार के चक्र में बांधे रखती है।
कश्मीर शैवमत के अनुसार, शक्ति की गति जब ऊर्ध्व या उन्मुख होती है तो वह मोक्ष या विस्तार की ओर ले जाती है, किंतु जब वह मध्य में अर्थात् सीमित अहंकार में फंसकर नीचे की ओर प्रवाहित होती है, तो वह संसार के विस्तार को जन्म देती है। यहाँ 'प्रसव' का अर्थ केवल शारीरिक जन्म नहीं, बल्कि हर उस क्षणिक विचार, भावना और अनुभव का जन्म है जो हमें पूर्णत्व से अलग करके एक टूटे हुए अस्तित्व का अनुभव कराता है। यह सूत्र चेतावनी देता है कि यदि हम अपनी चेतना को मध्यम स्तर पर ही रोक देंगे, तो हमारा सृजन केवल दुख और सीमाओं को ही जन्म देगा।
चिंतन दिन भर में जब भी कोई तीव्र भावना जैसे क्रोध, भय या अत्यधिक आसक्ति उठे, तो तुरंत रुककर यह देखें कि यह भावना आपको विस्तार दे रही है या संकुचित कर रही है। यदि आप स्वयं को छोटा, अलग या सीमित अनुभव कर रहे हैं, तो समझ लें कि चेतना 'मध्य' में फंसकर 'अवर प्रसव' कर रही है। उसी क्षण, बिना भावना का दमन किए, केवल साक्षी भाव से यह देखें कि यह संकुचन कैसे हो रहा है और धीरे से अपनी चेतना को उस सीमा से हटाकर उस विस्तृत आकाश की ओर ले जाएं जिसमें यह भावना आ रही है और जा रही है।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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