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Tritiya Unmesa — Anavopaya

Sutra 3.24

मात्रा स्व प्रत्यय सधाने नष्टस्य पुनरुत्थानम्

अनुवाद मात्राएँ (इंद्रिय-विषय) स्वयं के प्रत्यय (अहं-भाव) की साधना में नष्ट हो चुके उस व्यक्ति के पुनरुत्थान का कारण बनती हैं।

अर्थ इस सूत्र में 'मात्रा' से तात्पर्य इंद्रियों के विषयों या बाह्य संवेदनाओं से है, जो सामान्यतः चेतना को बाहर की ओर खींच ले जाती हैं। 'स्वप्रत्ययसाधने' का अर्थ है अपने वास्तविक स्वरूप, अर्थात् शुद्ध अहंभाव या शिव-स्वरूप की प्राप्ति हेतु की गई साधना। जब कोई साधक इस साधना में इतना गहरा हो जाता है कि उसका सीमित 'मैं' (अणुत्व) पूरी तरह नष्ट हो जाता है और वह अद्वैत शिव-तत्व में लीन हो जाता है, तो फिर भी यदि सूक्ष्म वासनाएँ शेष रह गई हों, तो ये बाह्य विषय-मात्राएँ उसमें पुनः संकुचित अहंकार के जाग्रत होने का कारण बन सकती हैं। यह सूत्र उस अवस्था की ओर संकेत करता है जहाँ आंतरिक स्थिरता पूर्ण नहीं हुई है और बाह्य स्पर्श पुनः भेद-भाव को जन्म दे सकता है।

काश्मीर शैवमत के अनुसार, जब तक 'अणु' या सीमित个体त्व की जड़ें पूरी तरह नहीं जल जातीं, तब तक इंद्रिय-विषयों का संपर्क खतरनाक हो सकता है। यहाँ 'नष्टस्य' से तात्पर्य उस व्यक्ति से है जिसका अहंकार क्षीण तो हुआ है पर पूर्णतः दग्ध नहीं हुआ है। यदि चेतना का आधार अभी भी थोड़ा सा द्वैत पर टिका है, तो मात्राएँ (विषय) उसमें पुनरुत्थान (उठान) ला सकती हैं, जिससे साधक वापस संसार के भ्रम में फँस सकता है। अतः यह सूत्र सावधानी का संकेत देता है कि केवल अहंकार के क्षीण होने मात्र से कार्य पूर्ण नहीं होता; आवश्यक है कि चेतना इतनी दृढ़ हो जाए कि विषय-मात्राएँ उसे विचलित न कर सकें।

चिंतन दिन भर के लिए यह अभ्यास करें कि जब भी कोई सुखद या दुखद विषय (मात्रा) इंद्रियों के माध्यम से मन को स्पर्श करे, तो तुरंत जाँचें कि क्या उस स्पर्श से 'मैं' की कोई प्रतिक्रिया जाग रही है। यदि भीतर कोई आकर्षण या विकर्षण उठे, तो उसे दबाने के बजाय उसे केवल देखें और स्वयं से पूछें कि क्या यह प्रतिक्रिया उस 'शुद्ध मैं' से आ रही है जो सबका साक्षी है, या फिर उस पुराने, सीमित अहंकार से जो अभी भी जीवित है। इस जागरूकता के साथ रहें कि विषय स्वयं में दोषी नहीं हैं, दोष तब होता है जब चेतना उनमें उलझकर अपने स्वरूप को भूल जाती है। जब विषय आएँ तो उन्हें बाहर रहने दें, भीतर प्रवेश न करने दें; यही सावधानी उस पुनरुत्थान को रोकती है और साधक को शिव-स्वरूप में स्थिर रखती है।

A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.

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