Sutra 3.25
शिव तुल्यो जायते
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अनुवाद वह (साधक) शिव के तुल्य हो जाता है।
अर्थ यह सूत्र तृतीय उन्मेष में आने वाला एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो अणुपाय की सीमा और उसकी चरम अवस्था को दर्शाता है। जब साधक अणुपाय के माध्यम से अपने व्यक्तिगत अहंकार, सीमित ज्ञान और संकुचित क्रियाओं का निरंतर शोधन करता है, तो वह धीरे-धीरे अपनी पशुभावना से मुक्त होता है। इस प्रक्रिया का अंतिम फल यह नहीं है कि वह शिव बन जाता है, क्योंकि वह मूलतः शिव ही है, बल्कि यह है कि वह शिव के 'तुल्य' या समान अधिकार वाला हो जाता है। यहाँ 'तुल्य' शब्द का अर्थ है स्वरूप में पूर्णतः एक हो जाना, जहाँ साधक और साध्य के बीच का भेद मिट जाता है।
कश्मीर शैवमत के अनुसार, शिवत्व कोई बाहर से प्राप्त करने योग्य वस्तु नहीं है, बल्कि यह हमारा सहज स्वरूप है जो केवल आवरणों के हटने पर प्रकट होता है। जब अणुपाय द्वारा चित्त की मलिनता दूर हो जाती है, तो साधक की चेतना उसी विस्तार को प्राप्त कर लेती है जो परमशिव की है। अब वह सीमित जीव नहीं रह जाता जो कर्मों का भोगता है, अपितु वह उसी सृजन, स्थिति और संहार की शक्ति का स्रोत बन जाता है। उसकी इच्छा, ज्ञान और क्रिया स्वतंत्र हो जाती हैं, ठीक वैसे ही जैसे शिव की होती हैं।
चिंतन दिन भर में जब भी कोई कठिन परिस्थिति आए या कोई निर्णय लेना हो, तो क्षण भर के लिए रुकें और स्वयं से पूछें कि 'यदि मैं इस क्षण में शिव के तुल्य होता, अर्थात यदि मेरी चेतना पूर्णतः मुक्त और विस्तृत होती, तो मैं इस स्थिति को कैसे देखता?' इस प्रश्न के माध्यम से अपने संकीर्ण डर या लाभ-हानि के गणित को छोड़कर उस विशाल दृष्टि में स्थित होने का प्रयास करें जहाँ सब कुछ अपने आप स्पष्ट और सहज प्रतीत होता है।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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