Sutra 3.29
योऽविपस्थो ज्ञानहेतुश्च
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अनुवाद जो अवस्था में स्थित होकर ज्ञान का हेतु (कारण) बनता है, वही (सच्चा योगी या चेतना) है।
अर्थ इस सूत्र का तात्पर्य यह है कि साधक जब अपनी सहज और स्वाभाविक अवस्था में पूर्णतः स्थिर हो जाता है, तभी उसमें वास्तविक ज्ञान का उदय होता है। यहाँ 'अविपस्थ' शब्द उस दशा की ओर संकेत करता है जहाँ चित्त न तो इधर-उधर भटकता है और न ही किसी बाह्य वस्तु या आंतरिक विकल्प में फंसा होता है। यह एक ऐसा बिंदु है जहां द्वैत का क्षरण हो चुका होता है और चेतना अपने मूल स्वरूप में बिना किसी प्रयास के विद्यमान रहती है।
जब यह स्थिरता प्राप्त होती है, तो ज्ञान किसी बाहरी स्रोत से अर्जित नहीं किया जाता, बल्कि वह उसी स्थिर अवस्था से स्वतःस्फूर्त रूप से प्रवाहित होता है। कश्मीर शैवमत के अनुसार, ज्ञान कोई प्राप्त करने योग्य वस्तु नहीं है, बल्कि यह चेतना की अपनी ही प्रकृति है जो तब प्रकट होती है जब मन के वृत्ति-विकल्प शांत हो जाते हैं। अतः जो व्यक्ति इस अडोल अवस्था में प्रतिष्ठित रहता है, वही ज्ञान का वास्तविक कारण बन जाता है, क्योंकि उसकी स्थिति ही ज्ञान का स्रोत है।
चिंतन दिन भर में जब भी आप किसी कार्य को करते हुए या विश्राम करते हुए यह अनुभव करें कि आपका मन अतीत या भविष्य में भाग रहा है, तो तुरंत रुकें और केवल 'होने' की अनुभूति पर लौट आएँ। किसी विचार को सुधारने या किसी समस्या को सुलझाने का प्रयास न करें; बस उस क्षण में अपनी चेतना की उपस्थिति को महसूस करें। इस सरल स्मरण से कि 'मैं इस स्थिर चेतना में ही निवास कर रहा हूँ', आप धीरे-धीरे उस 'अविपस्थ' अवस्था को आमंत्रित करेंगे जहाँ से स्पष्टता और सहज ज्ञान उभरता है।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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