Sutra 3.31
स्थिति लयौ
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अनुवाद स्थिति और लय।
अर्थ इस सूत्र में 'स्थिति' से तात्पर्य जाग्रत अवस्था या चेतना के विस्तार से है, जबकि 'लय' का अर्थ है संहार या चेतना का अंतर्मुखी होकर विलीन हो जाना। त्रिक दर्शन के अनुसार, साधक को केवल समाधि या लय की अवस्था में ही नहीं बैठना चाहिए, बल्कि उसे जाग्रत अवस्था (स्थिति) और गहन विश्राम (लय) के बीच के अंतर को मिटाना होता है। जब तक साधक को लगता है कि जागरण और लय दो भिन्न-भिन्न अवस्थाएं हैं, तब तक वह द्वैत में फंसा रहता है।
वास्तविक सिद्धि तब होती है जब साधक यह पहचान ले कि यही चेतना, जो बाहर की दुनिया को देख रही है (स्थिति), वही चेतना भीतर शांत होकर विश्राम कर रही है (लय)। शिव तत्व न तो केवल विस्तार है और न ही केवल संकुचन; वह दोनों का साक्षी और आधार है। इस सूत्र का गूढ़ अर्थ यह है कि स्थिति और लय दोनों में आपका स्वरूप अपरिवर्तित और पूर्ण बना रहता है। बाह्य गतिविधि और आंतरिक शून्यता के बीच कोई दीवार नहीं है; दोनों एक ही चैतन्य स्पंदन के दो पहलू हैं।
चिंतन दिन भर में जब भी आप किसी कार्य में गहरे लीन हों (स्थिति) या फिर थककर विश्राम करें (लय), तो स्वयं से पूछें: 'क्या वह जागरूकता जो काम कर रही है, वही है जो अब आराम कर रही है?' इस प्रश्न के माध्यम से अवस्थाओं के बदलने पर भी अपने भीतर के उस अटल साक्षी को पहचानें जो न तो कर्म करता है और न ही सोता है, बल्कि सब कुछ होता हुआ देख रहा है।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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