Sutra 3.32
तत्-प्रवृत्तावप्यनिरासः संवेत्तृ भावात्
Personalised to your chart
अनुवाद उस (सीमित संवेदना या भेद-बुद्धि) के प्रवृत्त होने पर भी, संवेत्ता के स्वरूप का त्याग नहीं होता है।
अर्थ इस सूत्र में अभिनवगुप्त और क्षेमराज जैसे आचार्यों ने उस अटल सत्य की ओर संकेत किया है कि चाहे मन में कितने भी विकल्प, संस्कार या द्वैतभाव क्यों न उठें, उनका उदय होना ही आपकी चेतना के अस्तित्व को समाप्त नहीं करता। 'तत्-प्रवृत्तौ' का अर्थ है जब सीमित अहंकार या भेद की धारणाएं सक्रिय हो जाती हैं, तब भी 'संवेट्टृ भावात्' अर्थात् साक्षी चेतना के स्वरूप का नाश या त्याग संभव नहीं है। बादल आकाश में आते-जाते रहते हैं, कभी घने होकर सूर्य को ढक लेते हैं, किंतु इससे आकाश का अस्तित्व मिटता नहीं है न ही उसकी शुद्धता कम होती है।
त्रिक दर्शन में यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि मोक्ष या शिवत्व का अर्थ विकल्पों का पूर्णतः दमन नहीं, बल्कि यह जानना है कि वे विकल्प आपके वास्तविक स्वरूप से पृथक हैं। जब तक जीव यह समझता है कि 'मैं ही ये विचार हूँ', तब तक वह बंधन में रहता है। किंतु जैसे ही यह स्पष्ट होता है कि विचार तो आ-जा रहे हैं, परंतु 'मैं' तो वह हूँ जो उन्हें देख रहा है, वहीं से अनिरासः अर्थात् चेतना के स्वरूप का अविनाशी होना सिद्ध होता है। संवेत्ता कभी वस्तु नहीं बन सकता, वह सदैव विषयी बना रहता है, चाहे उसकी दृष्टि कितनी ही बाह्य विषयों में क्यों न लगी हो।
चिंतन आज के दिन जब भी मन में कोई तीव्र भावना, क्रोध, चिंता या कोई भ्रामक विचार उठे, तो उसे रोकने या बदलने का प्रयास न करें। बस एक क्षण के लिए रुककर यह देखें कि वह विचार आपके सामने नाच रहा है। स्वयं से दृढ़तापूर्वक पूछें: 'क्या यह विचार मुझे जानता है या मैं इस विचार को जान रहा हूँ?' इस साधारण से अवलोकन में आप पाएंगे कि विचार तो क्षणभंगुर हैं, परंतु उन्हें जानने वाली जो शांत उपस्थिति है, वह अक्षुण्ण बनी हुई है। यही 'अनिरास' का अनुभव है; भीड़ में खड़े होकर भी भीड़ का हिस्सा न बनना।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
Get your free birth chart →
Sign in and the readings shift to your own placements.
Go deeper
Sign in to ask your own questions of this sutra — answered
in its light, and in the light of your chart.
Sign in →
Drag to pan · scroll to zoom · click a node to open it