Sutra 3.34
तद्-विमुक्तस्तु केवली
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अनुवाद वह (उपायों से) विमुक्त हुआ पुरुष ही केवली है।
अर्थ इस सूत्र में 'तत्' का संकेत उन सभी साधना उपायों की ओर है जिनका वर्णन पूर्व में किया गया है—चाहे वे शरीर, प्राण या मन पर आधारित हों। जब साधक इन सभी उपायों को पूरी तरह से आत्मसात कर लेता है और अंततः इनके प्रति अपना आग्रह त्याग देता है, तब वह 'विमुक्त' होता है। यह अवस्था उस बिंदु की है जहाँ प्रयास समाप्त हो जाता है और केवल शुद्ध चेतना शेष रहती है। उपाय नाव की तरह हैं; किनारे पर पहुँचने के बाद नाव को छोड़ देना ही मुक्ति है।
'केवली' वह सिद्ध पुरुष है जो अब केवल 'एक' में स्थित है। उसके लिए द्वैत का कोई अस्तित्व नहीं बचा है, न ही उसे किसी बाह्य साधन या विधि की आवश्यकता है। वह स्वयं अपनी पूर्णता में विराजमान है, जहाँ कर्ता, करण और कर्म का भेद मिट चुका है। इस अवस्था में वह न तो कुछ प्राप्त करता है और न ही कुछ त्यागता है, क्योंकि उसे अनुभव हो जाता है कि वह सदा से शिव ही था। यह केवल्य या कैवल्य की परम दशा है जहाँ अणु (सीमित जीव) का विस्तार अनंत शिवत्व में हो चुका है।
चिंतन दिन भर में जब भी आप किसी ध्यान तकनीक, मंत्र जाप या श्वास के अभ्यास में लगे हों, तो उस क्षण का स्मरण करें जब आप प्रयास करना छोड़ दें। जानबूझकर उस बिंदु पर रुकें जहाँ विधि समाप्त होती है और केवल 'होना' शेष रहता है। उस क्षण में यह महसूस करें कि अब कोई साधक नहीं बचा है जो कुछ कर रहा हो, बल्कि केवल चेतना का स्वप्रकाशमान अस्तित्व बचा है। इस 'न doing' (न करने) की अवस्था में थोड़ी देर के लिए विश्राम करें और देखें कि कैसे प्रयास के पीछे छिपी वह शांति स्वतः प्रकट होती है।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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