Sutra 3.35
मोह प्रति संहतस्तु कर्मात्मा
Personalised to your chart
अनुवाद मोह के विरुद्ध (या मोह को नष्ट करने के लिए) कर्म का समूह या संहति ही उसका स्वरूप है।
अर्थ इस सूत्र में शिव बताते हैं कि जब तक साधक में गहरा मोह या भ्रम बना हुआ है, तब तक केवल ज्ञान या भाव से काम नहीं चलता। ऐसे अवस्था में 'अणोपाय' अर्थात क्रिया की शक्ति का आश्रय लेना आवश्यक हो जाता है। यहाँ 'संहत' शब्द महत्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है एकत्रित या समन्वित प्रयास। मोह एक जड़ और घना आवरण है, इसलिए उसे भेदने के लिए विक्षिप्त प्रयास नहीं, बल्कि शरीर, वाणी और मन के सभी कर्मों को एक ही लक्ष्य की ओर मोड़कर किया गया अनुष्ठान चाहिए।
दार्शनिक दृष्टि से यह सूत्र स्वीकार करता है कि द्वैत का भ्रम इतना गहरा है कि उसे तोड़ने के लिए क्रिया की आवश्यकता पड़ती है। जब तक 'मैं कर्ता हूँ' का भाव मोह के रूप में बना है, तब तक उसी कर्तृत्व का उपयोग करके, परंतु उसे ईश्वरार्पित करके या विशिष्ट तंत्रिक विधियों के माध्यम से, उसी मोह का दहन किया जाता है। अग्नि से ही अग्नि को शांत करने की तरह, मोह रूपी अज्ञान को नष्ट करने के लिए संकल्पित कर्मों की संहति ही उपाय बन जाती है, जो अंततः साधक को शुद्ध चेतना की ओर ले जाती है।
चिंतन आज के दिन जब भी आप किसी कार्य में उलझें या मन में भ्रम महसूस करें, तो उस कार्य को यांत्रिक रूप से न करें। एक संकल्प करें कि आज का हर छोटा-बड़ा कर्म—चाहे वह चलना हो, बोलना हो, या किसी वस्तु को छूना—केवल उस मोह को तोड़ने के लिए समर्पित है जो आपको अपनी वास्तविक शिव-स्वभाव से अलग करता है। प्रत्येक क्रिया को पूर्ण सजगता और एकाग्रता के साथ करें, मानो वह एक पवित्र अनुष्ठान हो जो आपके आंतरिक अंधकार को चीर रहा है।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
Get your free birth chart →
Sign in and the readings shift to your own placements.
Go deeper
Sign in to ask your own questions of this sutra — answered
in its light, and in the light of your chart.
Sign in →
Drag to pan · scroll to zoom · click a node to open it