Sutra 3.38
त्रिपदाद्यनु प्राणनम
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अनुवाद त्रिपदादि (तीन अवस्थाओं के आरंभ) से प्राणन (प्राणों की गति या स्पंदन) होता है।
अर्थ इस सूत्र में शिव बताते हैं कि जब चेतना जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीन सामान्य अवस्थाओं की सीमाओं को लांघकर चौथी अवस्था अर्थात तुर्यावस्था की ओर उन्मुख होती है, तो वहाँ एक नवीन प्रकार का 'प्राणन' या जीवन-स्पंदन आरंभ होता है। यह साधारण श्वास-प्रश्वास नहीं है, बल्कि अंतर्मुखी चेतना का वह सूक्ष्म कंपन है जो सीमित व्यक्तिगत अहंकार (अणु) के पिघलने और विश्वव्यापी शिव-सत्ता के उदय का संकेत देता है। त्रिपदाद्य का अर्थ है उन तीन अवस्थाओं के पार जाने का प्रारंभिक बिंदु, जहाँ से वास्तविक आध्यात्मिक जीवन की धारा बहना शुरू होती है।
अणुपाय के संदर्भ में, यह प्रक्रिया श्वास और मन की एकाग्रता के माध्यम से घटित होती है। जब साधक इन तीनों बाह्य और आंतरिक अवस्थाओं के बीच के अंतरालों को पहचानना शुरू करता है, तो उसकी प्राण शक्ति स्थूल शरीर से हटकर सूक्ष्म नाड़ियों और अंततः मध्यमा नाड़ी या सुषुम्ना में प्रवाहित होने लगती है। यह 'प्राणन' उस दिव्य ऊर्जा का जागरण है जो पहले निद्रावस्था में थी और अब साधक को भेद-बुद्धि से मुक्त करके अद्वैत अनुभव की ओर ले जा रही है। यह वह क्षण है जब जीव को अपना वास्तविक स्वरूप याद आने लगता है।
चिंतन दिन भर में जब भी आप श्वास ले रहे हों, तो केवल हवा के आने-जाने पर ध्यान न दें, बल्कि उस क्षण पर ध्यान केंद्रित करें जब एक श्वास समाप्त होता है और दूसरी शुरू होने से पहले एक सूक्ष्म विराम या ठहराव आता है। उस क्षणिक रुकावट में, जहाँ न तो पिछला विचार है और न ही अगला, वहाँ जो सजीव मौन और कंपन महसूस हो, उसे ही 'त्रिपदाद्यनु प्राणन' मानें। इस विराम में थोड़ी देर ठहरकर देखें कि कैसे आपकी चेतना जाग्रत, स्वप्न और गहरी नींद इन तीनों सीमाओं से परे एक स्वतंत्र अस्तित्व का अनुभव कर रही है।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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