Sutra 3.4
शरीरे संहारः कलानाम्
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अनुवाद शरीर में कलाओं का संहार (या लय) होता है।
अर्थ इस सूत्र का तात्पर्य है कि जब साधक आणवोपाय के माध्यम से गहन अवस्था में प्रवेश करता है, तो उसकी शारीरिक चेतना में इंद्रियों और मन की विक्षिप्त शक्तियों, जिन्हें 'कलाएं' कहा गया है, का संकुचन या विलय हो जाता है। सामान्य अवस्था में ये कलाएं बाह्य विषयों की ओर प्रवाहित होकर हमें द्वैत का अनुभव कराती हैं, किंतु यहाँ शरीर ही उस पात्र या क्षेत्र बन जाता है जहाँ ये बिखरी हुई ऊर्जाएं वापस समेट ली जाती हैं। यह कोई शारीरिक मृत्यु नहीं, बल्कि चेतना का वह क्षण है जब बाह्याभिमुख वृत्तियां रुककर अंतर्मुख हो जाती हैं।
कश्मीर शैवमत के अनुसार, यह संहार विनाश नहीं अपितु एकत्रीकरण है। जैसे नदियां समुद्र में मिलकर अपना अलग अस्तित्व खो देती हैं, वैसे ही साधक की सीमित क्रियाशक्तियां शरीर के भीतर ही शिव की पूर्ण चेतना में लीन होने लगती हैं। इस प्रक्रिया में साधक को यह अनुभव होता है कि उसका शरीर अब केवल मांस और अस्थि का पिंड नहीं, बल्कि उन सभी शक्तियों का संहार-स्थल है जहाँ से नया और उच्चतर चेतना का उन्मेष प्रकट होने वाला है। यह अवस्था बाह्य क्रियाओं के स्थगन और आंतरिक पूर्णता के जागरण का सेतु है।
चिंतन दिन के किसी शांत क्षण में, जब आप बैठे हों, तो अपनी सारी इंद्रियों को बाह्य विषयों से धीरे-धीरे वापस खींचने का अभ्यास करें। कल्पना करें कि आपकी देखने, सुनने और स्पर्श करने की शक्ति बाहर से हटकर आपके शरीर के केंद्र में समेट रही है, ठीक वैसे ही जैसे कमल की पंखुड़ियां शाम को बंद हो जाती हैं। इस प्रक्रिया में यह न देखें कि क्या गायब हो रहा है, बल्कि इस अनुभव को महसूस करें कि आपके शरीर के भीतर एक गहन मौन और ऊर्जा का सघन रूप जमा हो रहा है, जहाँ सभी बिखरी हुई वृत्तियां शांत होकर एक हो रही हैं।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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