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Tritiya Unmesa — Anavopaya

Sutra 3.44

नासिकाऽन्तर्मध्य संयमात् किमत्र सव्यापसव्य-सौषुम्णेषु

अनुवाद नासिका के भीतर और मध्य में संयम करने से (प्राणों का नियंत्रण होता है); यहाँ (इस अवस्था में) सव्या, अपसव्या और सुषुम्णा नाड़ियों में क्या भेद रह जाता है?

अर्थ इस सूत्र का तात्पर्य प्राणायाम या श्वास की सूक्ष्म गति पर ध्यान केंद्रित करने की उस उच्च अवस्था से है जहाँ द्वैत का अंत हो जाता है। सामान्यतः योगिक परंपराओं में इडा (सव्या), पिंगला (अपसव्या) और सुषुम्णा नाड़ियों के बीच स्पष्ट अंतर माना जाता है, जो क्रमशः चंद्र, सूर्य और अग्नि तत्वों या बाएं, दाएं और मध्य मार्गों से संबंधित हैं। लेकिन जब साधक नासिका के आंतरिक मध्य बिंदु में पूर्ण एकाग्रता या संयम प्राप्त कर लेता है, तो ये तीनों धाराएँ एक हो जाती हैं। उस क्षण में प्राणों की गति इतनी सूक्ष्म और एकीकृत हो जाती है कि अब यह पहचानना असंभव हो जाता है कि श्वास किस नाड़ी में बह रही है।

काश्मीर शैवमत के दृष्टिकोण से, यह केवल शारीरिक प्रक्रिया नहीं बल्कि चेतना के विलीन होने का संकेत है। 'किमत्र' (यहाँ क्या है?) का प्रश्न इस तथ्य की ओर इशारा करता है कि जब मन और प्राण मध्य में स्थिर हो जाते हैं, तो भेदभाव की वृत्ति समाप्त हो जाती है। सव्या और अपसव्या द्वैत के प्रतीक हैं, जबकि सुषुम्णा अद्वैत का मार्ग है। जब संयम पूर्ण होता है, तो मार्ग और यात्री दोनों एक हो जाते हैं; वहाँ अब कोई 'बायां', 'दायां' या 'मध्य' नहीं बचता, केवल शुद्ध 'अहं' या शिव-स्वरूप शेष रहता है। यह अनवोपाय की उस सीमा है जहाँ उपाय ही लय हो जाता है।

चिंतन आज अपने दिन में कई बार, विशेषकर जब मन विचलित हो या श्वास अस्थिर लगे, कुछ क्षणों के लिए नासिका के ठीक मध्य बिंदु पर, दोनों नासिका छिद्रों के बीच की उस आंतरिक दीवार पर ध्यान दें। श्वास को नियंत्रित करने का प्रयास न करें, बल्कि केवल उस स्थान को महसूस करें जहाँ से श्वास का प्रवाह आरंभ होता और समाप्त होता प्रतीत होता है। जब आप इस मध्य बिंदु में स्थिर हों, तो स्वयं से पूछें कि अब बाएं या दाएं प्रवाह का क्या अर्थ रह गया है? उस क्षणिक एकत्व और निस्तब्धता को अपने भीतर उतरने दें, यह जानते हुए कि सभी विरोधाभास उसी एक केंद्र में विलीन हो चुके हैं।

A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.

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