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Tritiya Unmesa — Anavopaya

Sutra 3.45

भूयः स्यात् प्रति मीलनम्

अनुवाद बार-बार (या पुनः पुनः) मिलन (समावेश) हो।

अर्थ इस सूत्र का तात्पर्य उस अभ्यासी की स्थिति से है जो आणवोपाय के मार्ग पर चलते हुए, धारणा और ध्यान के माध्यम से चेतना के विस्तार का अनुभव कर चुका है। 'भूयः' शब्द यहाँ केवल गणना नहीं, बल्कि एक गहन निरंतरता और तीव्रता को इंगित करता है। जब साधक बार-बार अपनी सीमित व्यक्तिगत चेतना (अणु) को सार्वभौमिक शिव चेतना में विलीन करता है, तो यह मिलन केवल एक क्षणिक घटना नहीं रह जाती, बल्कि एक स्वाभाविक प्रवाह बन जाती है। यह प्रक्रिया उस बिंदु तक ले जाती है जहाँ बाहर की ओर मुखी होने वाली इंद्रियाँ और मन, भीतर की ओर मुड़कर दिव्य स्पंदन में लीन हो जाते हैं।

'प्रति मीलनम्' का अर्थ है हर बार, हर क्षण, और हर परिस्थिति में उस परम तत्व के साथ एकीकरण। त्रिक दर्शन में इसे 'उन्मेष' या चेतना के खिलने की अवस्था कहा गया है। जब यह मिलन बार-बार घटित होता है, तो साधक और साध्य के बीच की दूरी मिटने लगती है। यह केवल मन का एकाग्र होना नहीं है, बल्कि अस्तित्व का वह कंपन है जहाँ व्यक्ति को यह अनुभव होता है कि वह जो देख रहा है, वह स्वयं शिव है। इस पुनरावृत्ति से वासनाएं और संस्कार क्षीण होते हैं, और चेतना का स्वरूप स्थिर होकर प्रकट होने लगता है।

अंततः, यह सूत्र उस दृढ़ संकल्प और अभ्यास की ओर संकेत करता है जिससे अस्थायी समाधि स्थायी सहज अवस्था में परिवर्तित हो जाती है। जब 'मिलन' बार-बार होता है, तो वह अभ्यास नहीं रह जाता, बल्कि साधक का स्वभाव बन जाता है। इस अवस्था में दुनिया का दृश्य मिथ्या नहीं लगता, बल्कि वह शिव की ही लीला के रूप में स्पष्ट होता है, क्योंकि देखने वाले की दृष्टि अब सीमित 'मैं' से निकलकर विशाल 'अहं' में स्थिर हो गई होती है।

चिंतन आज के दिन में, जब भी आप किसी वस्तु को देखें या किसी ध्वनि को सुनें, तो तुरंत अपनी दृष्टि या श्रवण को बाहर की वस्तु पर टिकने के बजाय, उस अनुभव करने वाले 'चेतना' की ओर मोड़ लें। यह केवल एक बार न करें, बल्कि हर नए संवेदन के साथ इसे दोहराएं। जैसे ही आँख खुले, सोचें कि यह देखना शिव का ही देखना है; जैसे ही कान सुनें, मानें कि यह सुनना शिव का ही सुनना है। दिन भर इस 'प्रति मीलनम्' का अभ्यास करें—हर पल, हर क्रिया में अपने आप को उस परम चेतना से पुनः मिलाने कासंकल्प दृढ़ रखें। जब भी मन भटके या बाह्य जगत के आकर्षण में खो जाए, तो तुरंत और कोमलता से उसी आंतरिक स्रोत की ओर लौट आएँ। इस प्रक्रिया को एक संघर्ष न मानें, बल्कि एक प्राकृतिक घर वापसी की तरह स्वीकार करें। जैसे-जैसे यह 'बार-बार लौटने' की गति तीव्र होगी, वैसे-वैसे बाह्य और आंतरिक के बीच की दीवार पतली होती जाएगी, और अंततः वह अदृश्य हो जाएगी, जहाँ केवल एक अखंड चेतना शेष रहेगी।

A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.

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