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Tritiya Unmesa — Anavopaya

Sutra 3.5

नाड़ी संसार-भूत जय-भूत कैवल्य-भूत पृथक्त्वानि

अनुवाद नाड़ियाँ, संसार की अवस्था, जय (विजय) की अवस्था और कैवल्य (पूर्ण स्वतंत्रता) की अवस्था—ये सभी पृथक-पृथक तत्त्व या भूमिकाएँ हैं।

अर्थ इस सूत्र में शिवजी स्पष्ट करते हैं कि साधना के विभिन्न चरण या अनुभव, जो अक्सर एक-दूसरे से भिन्न प्रतीत होते हैं, वास्तव में चेतना के ही विभिन्न स्वरूप हैं। 'नाड़ी' यहाँ सूक्ष्म ऊर्जा के प्रवाह या प्राणिक चैनलों का प्रतीक है, जो व्यक्तिगत अस्तित्व का आधार हैं। 'संसार-भूत' उस अवस्था को कहते हैं जहाँ साधक द्वैत और बाह्य जगत में लिप्त होता है। 'जय-भूत' वह क्षण है जब साधक अपनी आंतरिक शक्तियों पर विजय प्राप्त करता है और भेदभाव मिटने लगता है। अंत में 'कैवल्य-भूत' वह पूर्ण स्वतंत्रता है जहाँ केवल शुद्ध अहं या शिवतत्व शेष रह जाता है।

परंतु यहाँ 'पृथक्त्वानि' शब्द का प्रयोग एक गहरे तात्पर्य के साथ किया गया है। यह केवल यह नहीं कह रहा कि ये अवस्थाएँ अलग-अलग हैं, बल्कि यह संकेत दे रहा है कि अनवोपाय (सीमित जीव के स्तर से开始的 साधना) में साधक को इन भूमिकाओं के बीच के अंतर को समझना आवश्यक है। जब तक साधक इन अवस्थाओं को पृथक मानकर उनसे होकर गुजरता है, तब तक वह यात्रा कर रहा है। यह विभेद ही साधना की सीढ़ी है। जैसे-जैसे साधक परिपक्व होता है, उसे एहसास होता है कि ये पृथक प्रतीत होने वाली अवस्थाएँ वास्तव में एक ही चेतना की कंपन हैं, लेकिन आरंभ में इनके स्वरूप को अलग-अलग पहचानना ही मुक्ति की ओर अग्रसर होने का मार्ग है।

चिंतन आज के दिन जब भी आप अपने शरीर में किसी प्रकार की ऊर्जा का प्रवाह (नाड़ी), बाह्य जगत की भीड़-भाड़ (संसार), किसी छोटी सफलता का गर्व (जय), या अचानक आई शांति (कैवल्य) का अनुभव करें, तो तुरंत रुककर यह विचार करें कि यह केवल चेतना की एक विशिष्ट 'अवस्था' या 'भूमिका' है। इनमें से किसी एक में भी पूर्णतः तादात्म्य न बनाएँ। स्वयं को उस अनुभव से थोड़ा पीछे हटाकर देखें और मानसिक रूप से कहें, 'यह नाड़ी है, यह संसार है, यह जय है,' और स्वयं को उनसे पृथक साक्षी भाव में स्थिर रखें। इस पृथकत्व के बोध से ही आप बंधन से मुक्त होकर अगले चरण की ओर बढ़ेंगे।

A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.

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