Sutra 3.6
मोहावरणात् सिद्धिः
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अनुवाद मोह के आवरण के हटने से सिद्धि प्राप्त होती है।
अर्थ यह सूत्र बताता है कि वास्तविक सिद्धि या पूर्णता बाहरी चमत्कारों या नई शक्तियों को प्राप्त करने में नहीं, बल्कि आंतरिक भ्रम के परदे को हटाने में निहित है। 'मोह' यहाँ अज्ञान उस अवस्था को कहते हैं जहाँ व्यक्ति अपने स्वयं के दिव्य स्वरूप को भूलकर सीमित देह और मन को ही सत्य मान लेता है। जब तक यह भ्रम बना रहता है, तब तक आत्मा अपनी अनंत शक्ति और चेतना से वंचित रहती है, मानो बादलों से ढका हुआ सूर्य।
जैसे ही गुरु की कृपा या तीव्र विचार-विमर्श द्वारा इस मोह का आवरण छिन्न-भिन्न होता है, वैसे ही सहज सिद्धि प्रकट हो जाती है। यह सिद्धि कोई अर्जित वस्तु नहीं है जो पहले नहीं थी, बल्कि यह आपकी अपनी मूल प्रकृति है जो अब बाधाओं के अभाव में स्वतः स्फुरित होती है। कश्मीर शैवमत के अनुसार, जब 'अनवोपाय' की अवस्था में ईश्वरीय इच्छाशक्ति स्वतः कार्य करती है, तो मोह मिटता है और जीव को अपनी शिवत्व की प्राप्ति होती है, जो अंतिम और एकमात्र सच्ची सिद्धि है।
चिंतन आज के दिन में जब भी आप किसी समस्या, डर या सीमित भावना से घिरें, तो तुरंत रुककर यह विचार करें कि क्या यह भावना वास्तविक सत्य है या केवल 'मोह' का एक आवरण है। स्वयं से पूछें कि यदि यह भ्रम अभी इसी क्षण हट जाए, तो मेरे भीतर कौन सी स्वाभाविक शांति या शक्ति प्रकट होगी? किसी नई उपलब्धि को पाने का प्रयास करने के बजाय, केवल उस भ्रम को देखें जो आपको आपकी पूर्णता से अलग कर रहा है और उसे छोड़ देने का संकल्प करें।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.
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