Sutra 3.7
अनुवाद मोह पर विजय प्राप्त करना अनंत आनंद का उपभोग करने से होता है, और सहज विद्या (स्वाभाविक ज्ञान) पर विजय प्राप्त करना उसी मोह से होती है।
अर्थ इस सूत्र में शिव दो विरोधाभासी प्रतीत होने वाली लेकिन गहरी अंतर्संबद्ध सच्चाइयों को उजागर करते हैं। पहला भाग बताता है कि जब चेतना अपने स्वभाव में स्थिर होकर अनंत आनंद (आनंद-शक्ति) का अनुभव करती है, तो अज्ञान या भ्रम (मोह) अपने आप विलीन हो जाता है। यह मोह केवल तर्क से नहीं टूटता, बल्कि जब प्राणी अपने भीतर छिपे दिव्य आनंद के सागर में डुबकी लगाता है, तब सीमित अहंकार का अंधकार मिट जाता है। आनंद ही वह प्रकाश है जो मोह के बादलों को छंटवा देता है।
दूसरा भाग एक सूक्ष्म चेतावनी और गहन रहस्य है: सहज विद्या, अर्थात वह स्वाभाविक ज्ञान जो आत्मा का स्वरूप है, उस पर 'विजय' प्राप्त करने का अर्थ है उसे सीमित न करना। यदि साधक इस सहज ज्ञान को भी एक वस्तु बना ले या उसमें लिप्त होकर मोह (आसक्ति) का शिकार हो जाए, तो वह ज्ञान भी बंधन बन सकता है। अतः यहाँ 'मोह से जय' का तात्पर्य यह है कि जब तक मोह का मूल नहीं कटा, तब तक सहज विद्या पूर्णतः स्वतंत्र नहीं होती; या फिर इसका अर्थ यह भी लिया जा सकता है कि सहज विद्या की पूर्ण अभिव्यक्ति तभी होती है जब मोह के सभी सूक्ष्म संस्कारों पर विजय पा ली जाए। आनंद की पूर्णता ही मोह का अंत है, और मोह का अंत ही सहज विद्या की सच्ची स्थापना है।
चिंतन आज के दिन जब भी आप किसी समस्या, तनाव या दुविधा (मोह) में फँसे हुए अनुभव करें, तो उसे सुलझाने के लिए तर्क या विश्लेषण में न उलझें। बस एक क्षण के लिए रुकें और अपने भीतर उस शांति और पूर्णता के एहसास को खोजें जो किसी बाहरी परिणाम पर निर्भर नहीं है। उस आंतरिक आनंद के स्पंदन को महसूस करें, चाहे वह कितना भी क्षणिक क्यों न हो। देखें कि कैसे उस आनंद की एक किरण आपके भ्रम को पिघला देती है और स्थिति को नए सिरे से स्पष्ट कर देती है। याद रखें कि समाधान बाहर नहीं, बल्कि उस आनंदमय चेतना में है जो आपका मूल स्वरूप है।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.