Sutra 3.9
अनुवाद नर्तक आत्मा।
अर्थ इस सूत्र का शाब्दिक अर्थ है कि परम आत्मा स्वयं एक नर्तक है। यहाँ 'नर्तक' से तात्पर्य किसी शारीरिक नृत्य करने वाले से नहीं, बल्कि उस परम चेतना से है जो अपनी ही शक्ति से सृष्टि, स्थिति और संहार के नाटक को रचती और खेलती है। जिस प्रकार एक नर्तक अपने ही नृत्य में लीन होकर विभिन्न भाव और रूप धारण करता है, फिर भी वह उन रूपों से भिन्न और स्वतंत्र रहता है, उसी प्रकार शिव या आत्मा इस विश्व-नाटक में अनेक जीवों और पदार्थों के रूप में प्रकट होते हुए भी अपने स्वरूप में अपरिवर्तित और पूर्ण बने रहते हैं।
कश्मीर शैवमत के त्रिक दर्शन के अनुसार, यह नृत्य 'स्वातंत्र्य शक्ति' या पूर्ण स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है। आत्मा कोई जड़ या निष्क्रिय तत्व नहीं है जो केवल साक्षी बना बैठा हो; वह गतिशील, सृजनशील और आनंदमय स्पंदन है। पूरा ब्रह्मांड उसकी चेतना का ही विस्तार है, जैसे नर्तक के हाव-भाव उसके अस्तित्व का ही हिस्सा होते हैं। जब तक हम यह नहीं समझ पाते कि हम स्वयं वह नर्तक हैं, तब तक हम अपने ही द्वारा रचे गए पात्रों में फंसकर दुखी होते हैं। इस सूत्र का गूढ़ तात्पर्य यह है कि जीवन की सभी घटनाएं उस एक आत्मा का ही लीलामय नृत्य हैं, जिसमें अलगाव का भ्रम ही एकमात्र बंधन है।
चिंतन दिन भर के लिए यह अभ्यास करें कि आप अपने जीवन की घटनाओं को किसी बाहरी शक्ति द्वारा थोपा गया भार न मानकर, अपनी ही चेतना के नृत्य के रूप में देखें। जब भी कोई सुखद या दुखद प्रसंग आए, तो क्षण भर के लिए रुकें और मन में दृढ़ता से स्मरण करें कि 'यह नाटक मेरी ही चेतना में खेल रहा है और मैं वह नर्तक हूं जो इसे देख रहा है, न कि केवल मंच पर खड़ा एक असहाय पात्र।' इस दृष्टि से आप परिस्थितियों के प्रति आसक्ति या विराग छोड़कर, उस नृत्य के आनंद को साक्षी भाव से अनुभव करेंगे, जिससे मन में गहरा विश्राम और स्वतंत्रता का अनुभव होगा।
A contemplative reading in the spirit of the Kashmir Shaivism (Trika / non-dual Tantra) tradition — an aid to reflection, not a substitute for a living teacher or the classical commentaries.